बुनियाद संस्कारों की (a base of good human) | Hindi Story

"अरे पंडित जी अभी तक क्यों नहीं आये", मास्टर रौशन लाल जी अपने बेटों को आवाज लगाते हुए चिल्लाये, तभी उनका छोटा बेटा भरत भागता हुआ अपने पिता के पास आया और बोला - "पिताजी मैं अभी पंडित जी के घर से ही आया हूँ वो थोड़ी देर में आ जायेंगे". मास्टर साहब आज बहुत खुश थे - आज उनके बनाये हुए अपने घर का गृहप्रवेश जो था जिसे उन्होंने अपने बेटों को एक श्रेष्ठ बुनियादी शिक्षा और संस्कार देने के बाद अपने जीवन भर की कमाई, रिटायरमेंट में मिले पैसों, से बनाया था. उनके दोनों बेटे राम और भरत भी बहुत संस्कारी और पिता के आज्ञाकारी थे, और दोनों भाइओं कि नौकरी भी सरकारी विभाग में अच्छे पदों पर हो चूकी थी। दोनों भाइयों में आपसी प्रेम भी बहुत था. आज मास्टर साहेब के जीवन की सारी इक्षा पूरी हो गयी, बेटों का ब्याह तो उन्होंने पहले ही करवा दिया था. 

Indicative image of Buniyaad Sanskaaron Ki

मास्टर साहेब का परिवार समाज का सबसे खुशहाल परिवार था, कभी भी उनके परिवार में आपसी मतभेद नहीं होते थे, घर के सभी सदस्य उनकी ही बात को सर्वोपरि रखते और वो भी अपने परिवार के हर सुख-दुःख का हरदम ख्याल रखते थे. समाज के सारे लोगों की भी यही इक्षा रहती की उनके परिवार का भी माहौल मास्टर साहेब के घर जैसा हो. पर जो संस्कारों की बुनियाद मास्टर साहेब ने अपने बच्चों के बिच डाली थी, वो बहुत मुश्किल से ही किसी परिवार में दिखने को मिलता है. उनकी दोनों बहुओं के बिच भी एक सगी बहन से ज्यादा प्रेम था. या यूँ कहें की उनका घर किसी स्वर्ग से कम नहीं था. मास्टर साहेब अपने परिवार के साथ एक सुकून की जिंदगी बसर कर रहे थे और उनके बच्चे भी अपने पिता की छत्रछाया में एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे. समय भी अपनी रफ़्तार से बीतता चला जा रहा था की एक दिन अचानक मास्टर साहेब को सीने में दर्द सा महसूस हुआ, और जब तक उनके बेटे उन्हें अस्पताल लेकर जाते उनका देहांत हो चूका था. 

मास्टर साहेब के देहांत के बाद, समाज के लोग अक्सर ये बातें करते की कुछ दिनों में दोनों भाइयों के बिच बंटवारा तो हो ही जाएगा। पर जैसे जैसे समय बीतता गया, समाज के लोग ये देखकर आश्चर्य में थे की जैसा उनलोगों ने सोंचा था वैसा कुछ भी नहीं हुआ, होता भी कैसे "मास्टर साहब के संस्कारों की बुनियाद उतनी कमजोर नहीं थी की उनके मरणोपरांत उनके बेटे उसे भूल जाएँ". अभी भी दोनों भाइयों का संयुक्त परिवार एक ही छत के अंदर उसी माहौल में रह रहा था जैसा माहौल मास्टर साहेब घर में छोड़ कर गए थे. दोनों भाई समय के साथ बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे थे और उनके बच्चे भी बड़े हो रहे थे. पर दोनों भाइ अपने काम में व्यस्तता के कारण वो संस्कार अपने बच्चों को नहीं दे पा रहे थे जो संस्कार मास्टर साहेब ने उन दोनों भाइयों को दिया था. उनके बच्चों में उम्र के साथ-साथ स्वार्थ और ईर्ष्या की भावना भी तेजी से बढ़ रही थी, बड़ों की आज्ञा का पालन करना और परिवारिक हितों का ख्याल रखना तो उनलोगों के व्यवहार में तो था ही नहीं.  

राम और भरत के बच्चों के बड़े होने के बाद अब मास्टर साहेब के घर का माहौल बिल्कुल बदल चूका था, अब हर रोज दोनों भाइयों के बच्चे किसी न किसी बात पे आपस में झगड़ा करते और अपने माता पिता की कोई भी बात नहीं सुनते, जिस कारण दोनों भाई बहुत दुखी रहा करते थे. मास्टर साहेब के द्वारा अपने परिवार में डाले गए संस्कारों की बुनियाद अब कमजोर पड़ चुकी थी और वो दिन भी आ ही गया जब दोनों भाइयों ने अपने बच्चों के करतूतों से परेशान होकर अलग अलग रहने का निर्णय किया. अब मास्टर साहेब का परिवार बिखर चूका था, दोनों भाई चाहकर भी अपने बच्चों के कारण अब एक दूसरे के साथ नहीं रह सकते थे, और दोनों का अंतर्मन एक दूसरे के साथ समय बीताने को व्याकुल रहता. दोस्तों मास्टर साहेब का हँसता खेलता परिवार उनके पोतों में संस्कारों की कमी की वजह से बर्बाद हो चूका था. 

दोस्तों जिस तरह एक कमजोर बुनियाद के कारण बड़े से बड़ा महल भी एक हल्की सी भूकंप से जमीन पर टूटकर धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार संस्कारों की बुनियाद कमजोर होने पर नजदीकी से नजदीकी रिश्ते भी टूटकर बिखर जातें हैं और इंसान अपने निजी स्वार्थ के कारण अपनों को खोता चला जाता है. 

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धन्यवाद्  
 




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2 Comments

  1. Awesome...the education u have given through this story is very good..😊

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