नन्हा स्वाभिमान | Hindi Story

तीन दिनों से भूखा रवि (काल्पनिक) सड़क के सिग्नल पे हाथ में फटे कपड़े लेकर वहां रुकने वाली गाड़ियों की सफाई करने को भागता फिरता और उसमे बैठे लोगों को इस आशा भरी नजरों से देखता की कोई उसे कुछ खाने के लिए थोड़े पैसे देदे, पर हर बार निराशा ही हाथ लगती.  रवि की उम्र मात्र 8 साल की थी, उसके पिता, जो मजदूरी करते थे, का देहांत कुछ दिनों पहले हो गया था, माँ तो 2 साल के उम्र में ही चल बसी. हमदर्दी में आस पास के लोगों ने कुछ दिनों तक खाना पूछा, पर हमेशा के लिए कौन साथ देता है, धीरे धीरे कोई उसका हाल भी नहीं पूछ रहा था. उसके आस पास के अनाथ बच्चे भीख मांगकर अपना गुजारा करते, पर रवि स्वभिमानी था वह भीख मांगकर अपना पेट नहीं भरना चाहता था, इसलिए उसने सिग्नल पे लोगों की गाड़ियों को पोलिश करने का काम शुरू किया, पर यहाँ भी उसे तीन दिनों से रोटी का एक निवाला तक नसीब नहीं हुआ. 

अंत में वो भूख से परेशान होकर सड़क किनारे बैठ गया और अपने किस्मत के बारे में सोंच कर फुट-फुट कर रोने लगा, तभी सिग्नल पे सबसे पीछे खरी कार से एक सेठ की नजर उसपे पड़ी सेठ को दया आ गयी और वह अपनी कार से उतरकर रवि के पास गया और रवि से उसके रोने का कारण जानना चाहा, रवि ने उसे अपनी आपबीती सुनाई, इसी बिच सड़क पर पीछे से आती हुई तेज रफ़्तार ट्रक ने सेठ के कार में जोरदार टक्कर मार दी, पर सेठ के कार में न होने के कारण सेठ की जान बच गयी. सेठ मन ही मन ये सोंचने लगा की आज इस बच्चे के कारण ही मेरी जान बच पायी, और सेठ ने रवि को अपने साथ चलने को कहा. पर रवि ने सेठ को यह कहकर मना कर दिया की साहब, अगली बार जब अपनी नयी कार से इस सिग्नल पे आना तो मुझसे अपने कार की पोलिश जरूर करवाना. 

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सेठ को रवि के व्यवहार के कारण उससे लगाव हो गया, अब सेठ जब भी सिग्नल पे अपनी कार के साथ रुकता, रवि से कार की पोलिश जरूर करवाता और उसकी मजदूरी उसे दे देता. सेठ अक्सर उसे ज्यादा पैसे देने की कोशिश करता पर रवि सेठ से अपनी मजदूरी के ही पैसे लेता. अब रवि को खाने के पैसे सेठ से मिल जाते और कुछ अतिरिक्त पैसे जो उसे दूसरी गाड़ियों से मिलते उसे वह जमा करता. कुछ दिनों के बाद उसने अपना दाखिला पास के सरकारी स्कूल में भी करवा लिया. सुबह स्कूल जाता, शाम को लोगों के कार की पोलिश कर कुछ पैसे भी कमा लेता. इसी तरह उसने अपनी दसवीं तक की पढाई पूरी कर ली. 

अब उसके पास कुछ पैसे भी जमा हो गए थे, तो उसने अपना एक छोटा सा टी स्टॉल उसी सिग्नल के पास खोल लीया और अपने आगे की पढाई जारी रखी. धीरे धीरे उसकी जिंदगी अपने रास्ते पर आ रही थी, उसी दरम्यान एक दिन उस सिग्नल पे तैनात ट्रैफिक पुलिस उसकी दूकान को बंद कराने आये, रवि ने उनलोगों से इसका कारण पूछा, तो उनलोगों में से एक ने रवि को बताया की थोड़ी देर में इस राज्य के DIG साहब इधर से गुजरेंगे इसीलिए वो उसकी दूकान बंद करवा रहे हैं. 

अब रवि के दिमाग में DIG शब्द घऱ कर गया और उसने  DIG  बनने की सारी जानकारी इकठ्ठा कर ली और और मन ही मन IPS बनने की ठान ली और इसके लिए वो जी तोड़ मेहनत करने लगा. और एक दिन वो भी आ गया जब उसकी मेहनत रंग लायी और वह एक IPS Officer बन गया. अब उसकी जिंदगी फर्श से अर्श पे आ चुकी थी, लोग उसे सलाम करते, सभी उसकी इज्जत करते. एक दिन अचानक रवि को उस सेठ से मुलाक़ात हो गयी जिसने उसे बचपन में उसकी थोड़ी मदद की थी. सेठ उसे पहचान नहीं पाया पर रवि ने जा कर उसके पैर छुए और उसे अपनी याद दिलाई, सेठ उसकी जिंदगी में ये बदलाव देखकर ये समझ ही नहीं पा रहा था की ये सब कैसे हुआ, तो रवि ने उसे सारी कहानी बताई और उसने ये भी सेठ को बताया की क्यों उसने बचपन में सेठ के साथ जाने से मना कर दिया था, उसने बताया की वो किसी का एहसान लेकर अपनी जिंदगी नहीं जीना चाहता था उससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती, सेठ के एहसान से वो जिंदगी तो काट लेता पर वो ये सब नहीं कर पाता, जो उसने आज कर दिखाया है, ये सब सुनने के बाद सेठ ने उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया. आगे चलकर उसे promotion भी मिला और वो उस राज्य का एक बड़ा officer भी बना. 

दोस्तों, इस कहानी के माध्यम से मैं यही कहना चाहता हूँ की भले ही किस्मत आपके जिंदगी को मौत के कगार पे ले आये पर आप अपने अंदर के स्वाभिमान को मत मरने दीजिये. किस्मत समय के साथ अपनी रंग बदलती है पर एक बार ख़त्म हुआ स्वाभिमान दुबारा जीवन में कभी वापस नहीं आता. ये नन्हा सा बच्चा रवि बचपन में ही हालात से हार कर अगर अपने स्वाभिमान को मार देता, तो शायद आज वो ये सब नहीं कर पाता. उम्मीद करता हूँ की ये कहानी आपलोगों को पसंद आये. 

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