Jigar Ka Tukda: एक विधवा औरत की मार्मिक कहानी | Hindi Story

आज कौशल्या के घर के पास से गुजरने वाले गाँव के लोगो को खाने की बड़ी सुन्दर खुशबु आ रही थी, आती भी क्यों न आज वो अपने जिगर के टुकड़े बेटे सूरज के लिए पकवान जो बना रही थी. आज सूरज के दसवीं की परीक्षा का परिणाम आने वाला था. सूरज, कौशल्या का एकलौता बेटा था जिसे कौशल्या ने पति के देहांत के बाद मेहनत मजदूरी कर बड़े लाड़ से पाला था, सूरज को कभी उसके पिता की कमी महसूस न होने दी उसके हर शौख को वह किसी भी तरह पूरा करती. कौशल्या खाना बनाकर कुर्शी पर बैठी ही थी की सूरज बाहर से भागता हुआ आया और अपनी माँ के पैरों को छू कर बोला "माँ मैंने परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर ली मुझे 84% अंक मिले हैं". यह सुनकर मानो कौशल्या के ख़ुशी का ठिकाना न रहा और उसकी आँखों से  ख़ुशी के आँशु छलक आये. सूरज ने माँ से पूछा - माँ तुम रो क्यों रही हो, क्या मैंने परीक्षा में अच्छा नहीं किया? कौशल्या सूरज के सर पर हाँथ फेरती हुई बोली नहीं बेटे ये तो ख़ुशी के आँशु हैं. कौशल्या अपने आँशुओं को पोछते हुए सूरज के लिए खीर लेकर आयी और उसे बड़े प्यार से अपने हांथो से खिलाया.

सूरज ने पास के ही कॉलेज में अपना दाखिला करवा लिया और गाँव के बच्चों को tuition भी पढ़ाता, कौशल्या भी गांव के दूसरे घर में मेहनत मजदूरी करती. अब दोनों की जिंदगी बड़े अच्छे से बीत रही थी, दोनों माँ बेटे में बहुत प्यार था, सूरज अपनी माँ से पूछे बिना कोई काम नहीं करता था. समय के साथ सूरज ने अपनी पोस्टग्रेजुएट की पढाई पूरी कर ली और उसे शहर के एक अच्छी कंपनी में एक नौकरी का ऑफर भी मिल गया. सूरज ने आकर अपनी माँ को नौकरी की बात बताई और बोला उसे नौकरी के लिए शहर जाना पड़ेगा. कौशल्या को अपने बेटे को खुद से दूर जाने देने का मन तो नहीं था, पर बेटे की ख़ुशी के लिए उसने सूरज को शहर जाने को बोल दिया. सूरज ने शहर जाने की तैयारी शुरू कर दी और वो दिन भी आ गया जब सूरज अपनी माँ और अपने गांव को छोड़कर शहर के लिए चल पड़ा. 

इधर कौशल्या सूरज के शहर जाते हीं उसके लौटने का इंतज़ार करने लगी, छह महीने बीतने के बाद सूरज अपने गांव अपनी माँ से मिलने आया. कौशल्या बेटे के घर आने पर बहुत खुश थी, बेटे के खाने के लिए तरह तरह के पकवान बनाये. सूरज के खाने पे बैठने के बाद कौशल्या ने सूरज को थोड़ा हिचकिचाते हुए बोला - "बेटा अब तो तू शहर में अच्छी नौकरी कर रहा है और तेरी शादी की उम्र भी हो रही है, मैं चाहती हूँ की अब तुम्हारी शादी कर ही दूँ, पर अपने घर की स्थिति जर्जर है इसलिए मैं कहीं शादी की बात नहीं चला रही, घर की थोड़ी मरम्मत हो जाती तो मैं तेरी शादी की बात भी चलाती. सूरज ने हंस कर माँ की बातों का जवाब दिया -" माँ शादी तो हो ही जाएगी तुम चिंता क्यों करती हो और रही घर की बात तो इस पुराने घर में पैसे लगाने से क्या फायदा, 2-4 साल के बाद मैं शहर में हीं फ्लैट ले लूंगा और अगली बार आऊंगा तो तुझे भी शहर ही ले जाऊंगा". बेटे की बात सुनकर कौशल्या बहुत खुश हुई.

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अगली सुबह सूरज फिर शहर के लिए निकल गया. इधर कौशल्या इस आशा में दिन बिताने लगी की कुछ दिनों के बाद उसका बेटा उसे शहर ले जायेगा वहां वो अपने बेटे की शादी बड़ी धूमधाम से करेगी और अपने परिवार के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजारेगी. समय बीतता चला गया, पर कौशल्या का इंतज़ार कम नहीं हुआ. एक सुबह कौशल्या को सूरज का मनीऑर्डर मिला जिसमे सूरज की चिट्ठी भी थी. जिसमे लिखा था - "माँ मैंने शहर में ही अपने ऑफिस की एक लड़की से शादी कर ली और यहाँ एक घर भी खरीद लिया, समय की कमी होने के कारण मैं तुम्हे लेने तो नहीं आ पाया, तुम मनीआर्डर के पैसे से टिकट कटवा कर शहर आ जाना. सूरज ने चिट्ठी में अपना पता भी लिखकर भेजा था. कौशल्या ये सब पढ़कर थोड़ी दुखी तो हुई, पर बेटे की ख़ुशी में ही उसकी ख़ुशी थी. 

कौशल्या गांव के सरपंच की मदद से बेटे सूरज के पास शहर आ गयी. कुछ दिनों तक बेटे और बहु ने कौशल्या का बहुत सत्कार किया, पर माँ बेटे के प्यार को उसकी बहु धीरे धीरे नापसंद करने लगी. अब कौशल्या अपने बहु की नजरों में खटकने लगी थी. कौशल्या पुरे दिन घर का सारा काम करती पर उसकी बहु किसी न किसी काम में खोट निकाल कर कौशल्या को खरी खोटी सुनाती रहती और सूरज के भी कान भरकर उससे भी माँ को फटकार लगवाती. पर कौशल्या इसे बच्चों की नादानी समझ कर हंस कर टाल देती. एक दिन कौशल्या से घर की सफाई के दौरान एक शीशे का गुलदस्ता टूट गया, जिसपर सूरज ने पत्नी के कहने पर माँ को बहुत फटकारा, इन सब बातों से कौशल्या को बहुत दुःख हुआ और वो वापस अपने गांव जाने की ठान ली. कुछ दिनों के बाद कौशल्या अपने गाँव आ गयी और अपने पुराने कामों में लग गयी और कुछ दिनों के बाद गांव के मुखिया की मदद से किसी सरकारी योजना में उसे दो कमरों का पक्के का मकान भी मिल गया. कौशल्या अपने बेटे के व्यव्हार के कारण दुखी रहती थी और किसी तरह अपनी जिंदगी काट रही थी. 

उधर सूरज जिस शहर में रहता था वहां कुछ दिनों के बाद एक भयंकर भूकंप आया, जिसके कारण उसका घर टूट गया और उसकी नौकरी भी छूट गयी. जो पैसे उसने बचत कर रखे थे, उससे कुछ दिनों तक उसने किराये के मकान में समय बिताया, गांव भी लौटता तो किस मुँह से. जब पैसे ख़त्म होने लगे तो पत्नी ने भी उसका साथ छोड़ दिया. सब कुछ बर्बाद होने के बाद उसके पास गांव लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था. एक दिन कौशल्या घर में बैठे अपने बेटे की याद में रो रही थी तभी बाहर से दरवाजे को किसी ने खटखटाया. दरवाजा खोलने पर सामने सूरज आँखों में शर्म लिए खड़ा था, और माँ के सामने आते हीं उसके पैरों को पकड़कर फुट फुट कर रोने लगा. बेटे की ऐसी हालत देखकर कौशल्या को दया आ गयी और उसने सूरज को घर के अंदर बुला लिया और उसके आने का कारण पूछा, सूरज ने अपनी माँ को सारी बात बताई. सारी बात सुनने के बाद कौशल्या ने बेटे को हिम्मत दी और उसे गांव में ही अपने साथ रहने को कहा. सूरज भी अपनी माँ की बात मान कर माँ के साथ ही रहने लगा और फिर से tuition पढ़ाने का काम शुरु किया. दोनों माँ बेटे पहले की तरह ही जिंदगी बिताने लगे और कौशल्या भी अपने जिगर के टुकड़े के वापस आ जाने से खुश रहने लगी. 

दोस्तों इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है की आप भले ही कितने भी बड़े क्यों ना हो जाओ, पर अपने आधार को खुद से कभी अलग नहीं करना चाहिए, जैसे पेंड़ चाहे कितना भी बड़ा क्यूं न हो अपने जड़ से अलग होने पर सुख ही जाता है.  

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