रोचक है बाबा बैद्यनाथ धाम की कहानी ।

झारखण्ड राज्य के देवघर जिले में स्थित बाबा बैद्यनाथ का मंदिर पृथ्वी पर मौजूद बारह (12) ज्योतीर्लिंगों में से एक है। श्रावण मास में यहाँ पर लगने वाला श्रावणी मेला विश्वप्रसिद्ध है. भगवान शंकर का यह मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से 250 किलोमीटर और बिहार की राजधानी पटना से 248 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। प्रत्येक वर्ष श्रावण के महीने में करोड़ों शिवभक्त बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज से कांवर में गंगा जल लेकर लगभग 112 किलोमीटर की दुरी तय कर देवघर स्थित भगवान भोलेनाथ के इस ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने को आतें हैं. 

ज्योतिर्लिंग किसे कहते है, और यह कहाँ कहाँ हैं?

कहा जाता है की पृथ्वी पर जिस जिस स्थान पर भगवान् शंकर साक्षात् अवतरित हुए हैं, उन स्थानों पर ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई है। "ज्योतिर्लिंग" "ज्योति" और "लिंग (स्तम्भ)" की संधि है, जिसका अर्थ भगवान् शंकर की ज्योति का स्तम्भ रूप में विद्यमान होने से है।

पृथ्वी पर मौजूद 12 ज्योतिर्लिंग इस प्रकार से हैं: 
  • बाबा बैद्यनाथ मंदिर, देवघर, झारखंड 
  • नागेश्वर मंदिर, द्वारका, गुजरात 
  • घृष्णेश्वर मन्दिर, औरंगाबाद, महाराष्ट्र 
  • सोमनाथ मंदिर, गुजरात 
  • श्रीमल्लिकार्जुन मंदिर, आंध्र प्रदेश 
  • महाकालेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश 
  • ओंकारेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश
  • केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड 
  • भीमाशंकर मंदिर, महाराष्ट्र
  • काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस, उत्तर प्रदेश
  • त्र्यम्बकेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र 
  • रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम, तमिलनाडु
 

बाबा बैद्यनाथ धाम की कहानी  

हिन्दू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रेतायुग में लंकापति रावण भगवान् शंकर को कैलाश पर्वत से अपने यहाँ लंका ले जाने और युद्ध में अजेय रहने की कामना से हिमालय पर भगवान शंकर की कठोर तपस्या कर रहा था। बहुत दिनों की लम्बी तपस्या के बाद भी जब भगवान भोलेनाथ उसकी तपस्या खुश नहीं हुए, तब दशानन रावण तपस्या में भगवान शंकर को खुश करने के लिए अपने दस सिरों की आहुति एक-एक कर देने लगा। रावण अपने नौ सिरों की आहुति देने के बाद जब अपने दसवें  सिर की आहुति देने ही जा रहा था, तभी भगवान् शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। 

भगवान के द्वारा वरदान मांगने की अनुमति मिलने पर रावण ने भगवान् शंकर को कैलाश पर्वत छोड़कर स्वयं रावण के साथ लंका चलकर वहीँ विराजमान होने का वर माँगा, जिसपर भगवान् भोलेनाथ ने शिवलिंग के रूप में एक शर्त पर रावण के साथ लंका जाने की बात मान ली, वो शर्त यह थी की रावण भगवान की शिवलिंग लंका ले जाने के दौरान बिच रास्ते में कहीं नहीं रखेगा, और अगर उसने बिच रास्ते में कहीं ये शिवलिंग रख दिया तो भगवान् वहीँ स्थापित हो जायेंगे और फिर रावण उन्हें लंका नहीं  ले जा पायेगा ।

भगवान् शंकर के द्वारा रखे गए शर्त को मानकर रावण भगवान की शिवलिंग कांवर में रखकर अपने साथ लंका ले जाने लगा। इधर भगवान भोलेनाथ के कैलाश छोड़ने की खबर से सभी देवता परेशान हो उठे, जिसपर भगवान विष्णु ने एक माया रची। और जब रावण भगवान शंकर की शिवलिंग को लेकर देवघर के पास पहुँचा, भगवान् विष्णु की माया से उसे बहुत जोर की लघुशंका लगी, जिससे वो परेशान हो उठा, और चुकी वह शिवलिंग को धरती पर कहीं रख नहीं सकता था, वो कुछ समय के लिए उस कांवर को पकड़ कर खड़े रहने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश करने लगा, तभी अचनाक उसकी नजर बैजू नामक चरवाहे पर पड़ी और उसने बैजू को कुछ देर के लिए जब तक की वो लघुशंका न कर ले उस कांवर को कंधे पर टांग कर खड़े रहने को कहा, बैजू ने उसकी बात मान ली और रावण वो कांवर बैजू को देकर लघुशंका के लिए चला गया।  


Deoghar Mandir



इधर भगवान शंकर की माया से शिवलिंग का वजन धीरे धीरे बढ़ने लगा और कुछ समय के बाद जब बैजू उस कांवर को टांग पाने में असमर्थ हो गया तब उसने उस कांवर को जमीन पर रख दिया, जिससे भगवान् शिव वहीँ स्थापित हो गए । बहुत देर तक लघुशंका करने के बाद जब रावण वापस आया तो देखा की बैजू ने भगवान की शिवलिंग जमीन पर रख दी है, और उसके बाद रावण के लाख प्रयास करने के बावजूद भी वो उस शिवलिंग को उस जगह से हिला नहीं पाया, और अंत में क्रोधित होकर भगवान् की शिवलिंग को अंगूठे से वहीँ दबाकर लंका वापस चला गया।

इधर बैजू चरवाहा नित्य दिन पूर्ण प्रेम और भक्ति से भगवान के उस शिवलिंग की पूजा किया करता था और बाद में वह भगवान् शिव के परम भक्त के रूप में भी प्रसिद्ध हुआ, जिसके कारण ही इस मंदिर को बैजनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। 

क्यों होती है श्रावण महीने में भगवान् शंकर की पूजा? 

भगवान भोलेनाथ और श्रावण महीने को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं हैं, उन्ही कथाओं में से एक कथा यह भी है की माता सती ने जब अपना दूसरा जन्म पर्वतराज हिमालय के यहाँ माता पार्वती के रूप में लिया, तब उन्होंने नारद मुनि के कथनानुसार भगवान् शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में ही कठोर तपस्या की थी और भगवान् शिव को पति रूप में प्राप्त किया, जिस वजह से भगवान शिव को श्रावण मास अत्यधिक प्रिय है। 

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