मन का मैल (Dirt of Soul) | Hindi Story

आज मीनू के दूकान में लोगों की भीड़ देखकर दीपक मन-हि-मन बहुत दुखी हो रहा था. एक साल पहले पति के देहांत के बाद मीनू ने पति के प्रोविडेंट फण्ड से मिले पैसों से ये दूकान खोला था. दीपक मीनू का देवर था, वो बहुत ही दुष्ट स्वाभाव का और मन का मैला था, अपने भाई की मौत के बाद उसने पुरे पैतृक घर पे जबरदस्ती अपना अधिकार जमा लिया था, और मीनू को उसने उस घर से बेदखल कर दिया था. 

मीनू चुकी सीधी थी और उसपे अपने बच्चों को पालने का बोझ था और वो दीपक को भी हमेशा अपना ही समझती थी, वो कभी दीपक से झगड़ा मोल नहीं लेना चाहती थी, और उसी शहर में वो एक किराए के माकान में रहती थी. पर दीपक किसी न किसी प्रकार से मीनू को परेशान करता तथा हानि पहुँचाने की कोशिश करता रहता जिसे हमेशा मीनू माफ़ करती चली जाती । मीनू की लाचारी को देखकर दीपक को बहुत ही आनंद मिलता था और वो हमेशा मीनू को गरीब और लाचार ही देखना चाहता था। दीपक की पत्नी दीपक के ऐसी सोंच का विरोध करती और अक्सर उसे अपने मन के अंदर बैठे मैल को निकाल बाहर करने की सलाह देती, पर दीपक अपनी पत्नी को ही उल्टा डांट दिया करता था।  

इधर मीनू के अच्छे व्यवहार और पिछले एक साल के संघर्षों और मेहनत की वजह से उसकी दूकान धीरे-धिरे चलने लगी थी और मीनू का जीवन दुबारा अपनी पटरी पर आ रहा था ।  उसके बच्चे भी खाली समय में दूकान पर मीनू की मदद कर दिया करते थे। समय के साथ मीनू का व्यवसाय प्रगति कर रहा था और उसकी आय भी अच्छी हो रही थी ।

मीनू को ऐसे आगे बढ़ता देख दीपक परेशान रहने लगा था और वो किसी भी तरह मीनू की दूकान बंद करवाने का प्रयास करने लगा, पर वो इस काम में सफल नहीं हो पा रहा था ऐसा इसलिए क्यूंकि किसी इंसान के द्वारा किसी का बुरा चाहने से उस इंसान का बुरा नहीं होता, होता वही है जो भगवान् की मर्जी होती है।  तुलसीदास  जी ने भी रामचरितमानस में लिखा है:  

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।  को करि तर्क बढ़ावै साखा in image

फिर भी दीपक चुकी अपने मैले मन से ग्रसित था, हर प्रकार से असफल होने के बाद दीपक के मन में मीनू की दूकान में चोरी करवाने का विचार आया। उसने इसके लीए हर प्रकार की योजना तैयार कर ली थी। एक रात दीपक के भेजे गए चोर मीनू के दूकान पे चोरी करने पहुंचे और वे लोग जब मीनू के दूकान का ताला तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, उसी समय दूकान के पास के घर में रहने वाले एक आदमी ने उन चोरों की करतूत देख ली, और चुकी मीनू का व्यवहार सबके साथ अच्छा था, उसने चुपके से कुछ और मोहल्ले के लोगों को बुलाकर उन चोरों को पकड़ लिया। दूकान पे चोरी की खबर सुनने के बाद मीनू भी अपने  दूकान पे आ गयी थी। वहां पे जमा भीड़ ने जब चोरों से पूछताछ की तो उन चोरों ने बताया की - दीपक ने उन्हें पैसों का लालच देकर इस काम के लिया भेजा था।  चुकी दीपक मीनू का देवर था और उसने हमेशा उसे अपने बेटे की तरह माना था, मीनू ने इस बार भी दीपक की गलती को अनदेखा कर दिया और उन चोरों को वहां से जाने दिया। 

उधर दीपक को मीनू के बार बार माफ़ करने के बाद भी उसे अपनी गलती का एहसास नहीं हुआ था और वो अभी भी मीनू के लिए बुरा ही सोंचता था, पर उसके बुरा सोंचने से क्या होता। समय के साथ मीनू पैसों के मामले में भी  दीपक से कहीं आगे निकल चुकी थी, और दीपक बस मीनू की तरक्की देख दिन रात जलता रहता. 

एक रात दीपक जब खाना खाकर उठा ही था की अचानक बेहोश होकर वो जमीन पर गिर पड़ा, दीपक की पत्नी आननफानन में उसे अस्पताल लेकर गयी। अस्पताल में इलाज के दौरान दीपक की जाँच रिपोर्ट्स आने के बाद डॉक्टरों ने दीपक की पत्नी को बताया की दीपक को critical brain tumor है, जिसका जितना जल्द हो सके ऑपरेशन करवाना जरुरी है । इधर दीपक की जमा पूंजी अस्पताल के कुछ दिनों के खर्च में ही ख़त्म होने वाली थी, और ऑपरेशन के खर्च के लिए दीपक की पत्नी के पास पैसे नहीं बचे थे, इसके लिए दीपक की पत्नी ने बहुत से जानने वालों से मदद मांगी पर दीपक की कर्मों की वजह से कोई मदद के लिए तैयार नहीं हुआ.  

इधर जब मीनू को दीपक की बिमारी का पता चला वो दीपक को देखने फ़ौरन ही अस्पताल जा पहुंची । दीपक की पत्नी ने मीनू को सारी कहानी बताई और उसे ये भी बताया की उसके पास दीपक के ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं बचे हैं, इस पर मीनू ने उसे सांत्वना दी और दीपक के ऑपरेशन का सारा खर्च भी उठाया. ऑपरेशन के बाद जब दीपक ठीक होकर घर वापस आ गया था तब कुछ दिनों के बाद उसकी पत्नी ने उसे मीनू के मदद की सारी कहानी बताई और उसे ये भी एहसास करवाया की आज वो मीनू की वजह से ही जिन्दा है. दीपक की पत्नी ने उसे फिर से ये समझाया की वो अपने मन के सारे मैल हटाकर मीनू से जाकर माफ़ी मांगे। इस बार दीपक को अपनी गलती का एहसास हो गया था और वो अपने किये पे भी बहुत शर्मिन्दा था पर वो मीनू के सामने जाने की हिम्मत नहीं उठा पा रहा था, जिसके लिए उसने अपनी पत्नी को साथ चलने को कहा। 

मीनू के यहाँ पहुँचते ही दीपक मीनू के पैरों पे गिर गया और उससे अपने किये की माफ़ी मांगी, जिसपे मिनु ने उससे कहा की "मैंने तो तुम्हे कभी गलत माना ही नहीं था, मैं तो हमेशा तुम्हारी गलती को तुम्हारी नादानी समझ कर माफ़ करती चली गयी". मीनू की इन बातों को सुनकर दीपक बहुत रोया और अब उसके मन के सारे मैल धूल चुके थे। दीपक ने अपनी भाभी को फिर से अपने घर में चलने को कहा, पर चुकी मीनू ने अपना खुद का घर ले लिया था तो वो वापस नही गयी लेकिन अब सभी अलग होकर भी एक साथ हो गए थे और दीपक हमेशा अपने परिवार के साथ मीनू के परिवार का भी उतना ही ख्याल रखने लगा. 

दोस्तों इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है की किसी के बुरा सोंचने से किसी का बुरा नही होता और किसी इंसान के द्वारा किसी इंसान के प्रति मन में रखी गयी द्वेष की भावना खुद उसी इंसान को नुकसान पहुंचाती है, इसलिए कभी किसी का बुरा न ही सोंचने में भलाई  है.  

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