कर्ज का बोझ: एक बेगुनाह के गुनहगार होने की कहानी

अर्जुन स्कूल से वापस आकर घर के दरवाजे पर कदम ही रखता है की वो देखता है कुछ लोग उसकी माँ को धमकी भरे लहजे में भद्दी-भद्दी बातें कह रहे हैं, अपनी माँ के साथ हो रहे ऐसे व्यहवहार के कारण वो आपे से बाहर हो जाता है और उन लोगों से उलझ जाता है, जिसपर वे लोग अर्जुन की भी पिटाई कर देते हैं और विद्या को यह बोलते हुए वहां से चले जाते हैं की - "खाने को तो कर्ज लेती रहती है, और चली है बेटे को पढ़ाकर अफसर बनाने". उनलोगों के वहां से जाने के बाद अर्जुन सिसकता हुआ विद्या से पूछता है - "माँ वो लोग कौन थे और उन्होंने हमलोगों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?", जिसपर विद्या अर्जुन से कहती है - "बेटा इनलोगों से मैंने तुम्हारे पिता के श्राद्ध में कुछ कर्ज ले रखा था जिसे अभी तक लौटा नहीं पायी, ये वही अपना पैसा मांगने को आये थे". अर्जुन फिर अपनी माँ से बोलता है की आप इनका पैसा लौटा क्यों नहीं देती, कम से कम इनलोगों की गालियां तो नहीं सुननी पड़ेगी। जिसपर विद्या अर्जुन को यह कहती है की - बेटा इधर उधर कुछ काम कर जो भी थोड़ा बहुत कमाती हूँ, वो तो घर का खर्च पूरा करने में हीं ख़त्म हो जाता है, तो फिर कहाँ से इनलोगों का क़र्ज़ चुकाऊं, इसलिए वो जो भी बोल जाते हैं चुपचाप सुन लेती हूँ । अपनी माँ का जवाब सुनने के बाद अर्जुन निशब्द: हो चूका था, अब उसके पास अपनी माँ से पूछने को कुछ नहीं था ।   

आज उसके और उसके माँ के साथ हुई घटना उसके दिमाग में घर कर चुकी थी, और वो इन्ही सब बातों को रातभर जागकर सोंचता रहा । अगली सुबह जब विद्या सोकर उठी तो देखा अर्जुन अपने स्कूल के बैग में अपने कपड़े रख रहा था। अर्जुन को ऐसा करता देख विद्या ने अर्जुन से पूछा - "बेटा तू ये क्या कर रहा है, अपने कपड़े बैग में क्यों डाल रहा है?". अर्जुन ने विद्या से कहा - "माँ मैं पैसे कमाने शहर जा रहा हूँ, आज से मैं स्कूल नहीं जाऊंगा". अर्जुन एक कागज़ का टुकड़ा लेकर विद्या से कहता है की माँ तुम मुझे ये बता दो की तुमने किससे कितने पैसे ले रखे हैं, मैं जैसे जैसे पैसे कमाता जाऊंगा उनलोगों के क़र्ज़ चुकाता रहूँगा । अपने बेटे अर्जुन की बातों को सुनकर विद्या के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, विद्या रोते हुए अर्जुन से बोली "इतनी छोटी उम्र में तू कहाँ कमाने जाएगा, मैं किसी तरह उनके पैसे चूका दूंगी". पर अर्जुन ने अपनी माँ की हालत और लेनदारों के व्यवहार को देखने के बाद शहर जाने का फैसला कर लिया था और माँ को यह बोलता हुआ की - "माँ तुम मेरी चिंता मत करो, भगवान पे भरोशा रखो मुझे कुछ नहीं होगा" - अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर शहर के लिए निकल पड़ता है. 

कर्ज का बोझ (Hindi Story)

काम के लिए अनजान शहर में भटकते-भटकते अर्जुन को एक कार की गराज में नौकरी मिल जाती है, पर उस गराज का मालिक गराज के साथ साथ नशीले पदार्थों का अवैध काम भी करता था. इन सब बातों से अनजान अर्जुन मन लगाकर वहां काम करता रहा और वहीँ रहकर अगले कुछ महीनों में उसने कुछ लेनदारों के पैसे भी चुका दिए. अर्जुन जिस भी लेनदार के पैसे चुकाता, याद के लिए वो उस कागज़ में उनके लिखे नाम पर एक घेरा लगा दिया करता। अर्जुन अपने महीने की कमाई का कुछ हिस्सा अपनी माँ को भी भेज दिया करता था और कभी-कभी वो अपने गांव जाकर अपनी माँ से भी मिल आया करता । अर्जुन की जिंदगी अब सही चल रही थी, की एक दिन अचानक उसके गराज में पुलिस का छापा पड़ गया और छापे में पुलिस को गराज से कुछ नशीली दवाइयां मिली, जिसके बारे में अर्जुन अनजान था, पर चुकी गराज में अर्जुन के अलावा कोई था नहीं, पुलिस अर्जुन को गिरफ्तार कर अपने साथ ले गयी ।

थाने पहुँचने के बाद इंस्पेक्टर साहब को अर्जुन की तलाशी के दौरान उसके पास से कुछ पैसे और वो कागज मिला जिसपे अर्जुन ने लेनदारों के नाम लिख रखे थे. इंस्पेक्टर साहब के द्वारा उस कागज़ पे लिखे नामों के बारे में पूछने पर अर्जुन ने उनको अपनी सारी कहानी बताई, जिसे सुनंने के बाद इंस्पेक्टर साहब के मन में उसके प्रति सहानुभूति जाग उठी और वो किसी तरह अर्जुन को वहाँ से उसके गांव भेजने के बारे में सोंचने लगे. इंस्पेक्टर साहब इन सब बातों पर विचार हीं कर रहे थे की तभी उनको उनके सीनियर का फ़ोन यह कहने के लिए आता है की वो इस केस में अर्जुन का ही नाम डाले ।  सीनियर की बात सुनने के बाद इंस्पेक्टर साहब समझ चुके थे की इस कारोबार का मालिक कोई पहुंच वाला है और मजबूरन उन्हें अर्जुन के खिलाफ केस दर्ज करना पड़ा। अगले दिन जब अर्जुन पेशी के लिए अदालत गया तो वहां गराज के मालिक के वकील ने अर्जुन को दोषी साबित कर दिया, और अदालत ने उसे कुछ सालों के लिए जेल की सजा सुना दी ।  सजा मिलने के बाद अर्जुन इंस्पेक्टर साहब को रो-रो कर यह कहता है की  - "साहब मुझे किसी तरह जेल से छुड़वा दो, मेरी माँ ने जो कर्ज ले रखे थे मैं उसे भी पूरा नहीं चूका पाया हूँ, लेनदार मेरी माँ को जीने नहीं देंगे", इंस्पेक्टर साहब अर्जुन की बातों से बहुत भावुक हो गए और उसे जल्द ही जेल से छुड़वाने का आश्वासन दिया । 

अगले दिन इंस्पेक्टर साहब ने अर्जुन के गाँव जाकर लेनदारों के बचे हुए पैसे चूका दिए और विद्या को यह बोलकर की अर्जुन उनके यहाँ काम करता है कोई छोटा सा व्यवसाय शुरू करने के लिए कुछ पैसों की मदद भी कर दी। इधर जब गराज के मालिक को यह पता चलता है की इंस्पेक्टर साहब अर्जुन की मदद कर रहे हैं वो अपनी ऊँची पहुँच के दम पर उनका तबादला कही दूर दूसरे जिले में करवा देता है ।  इन सब घटनाओं से परेशान अर्जुन के मन में गराज के मालिक के खिलाफ बदले की भावना जाग उठती है, और वो जेल से निकलने के बाद उसकी हत्या करने का फैसला करता है, और सजा पूरी होने पर जेल से छूटने के बाद वो वैसा ही करता है जैसा उसने सोंचा था । और धीरे धीरे समय के साथ अर्जुन एक नामी और पशेवर अपराधी बन जाता है । 

दोस्तों, कभी कभी तथाकथित सभ्य समाज के लोग ही अपनी निजी हित के लिए किसी लाचार की बेबसी का गलत फायदा उठाकर उसे अपराधी बनने पर मजबूर करते हैं जो खुद में एक प्रकार का अपराध है, परन्तु समाज के लोगों को उनके बारे में पता नहीं चल पाता जो किसी अपराधी के अपराधी बनने का कारण हैं । 

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