हिन्दू, बौद्ध, और जैन धर्म के आस्था की अद्भुत संगम स्थली माँ भद्रकाली मंदिर, चतरा, झारखण्ड

दोस्तों, माँ भद्रकाली मंदिर, चतरा का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा है, परन्तु राष्ट्र स्तर पर इनक्रेडिबल इंडिया का हिस्सा होने के बावजूद, माँ भद्रकाली के इस मंदिर को अपनी महत्ता के अनुसार उतनी प्रसिद्धि नहीं मिल पायी है, जितनी मिलनी चाहिए थी. हिन्दू, बौद्ध, और जैन धर्म के आस्था की अद्भुत संगम स्थली माँ भद्रकाली का यह मंदिर झारखण्ड राज्य के राजधानी रांची से लगभग 150 किलोमीटर, झारखण्ड राज्य के जिला मुख्यालय चतरा से 35 किलोमीटर, और इटखोरी प्रखंड मुख्यालय से लगभग 1.5 किलोमीटर की दुरी पर मुहाने (महानद) नदी के किनारे पर हरे-भरे वन के बिच स्थित है. इस स्थान को भदुली के नाम से भी जाना जाता है. 

Maa Bhdrakali Temple, Chatra

इतिहास 

माँ भद्रकाली मंदिर का इतिहास बहुत ही प्राचीन है. हिन्दू धर्म के महाकाव्यों के अनुसार एक तरफ जहाँ त्रेतायुग में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ, वनवास के दौरान इस स्थान पर ठहरे थे वहीँ दूसरी तरफ द्वापरयुग में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान इस स्थान को युधिष्ठिर की तपस्या का केंद्र बताया गया है. 

कुछ समय पहले यहाँ पर पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई में मिले काले पत्थरों की मूर्ति का सम्बन्ध शक, गुप्त, और वर्धन काल से बताया जाता है, जिसका इतिहास लगभग 1,500-2,000 साल पुराना है. इस स्थान की पहचान जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान् शीतलनाथ की जन्म स्थली के रूप में भी है, कहा जाता है की यहाँ जन्मे भगवान् शीतलनाथ को ज्ञान की प्राप्ति इसी जिले (चतरा) में स्थित माँ कौलेश्वरी पर्वत पर हुई थी, जिसके बाद उन्होंने पारसनाथ में मोक्ष की प्राप्ति की थी. 

कहा जाता है की यहाँ पर निर्वाण प्राप्ति से पहले भगवान गौतम बुद्ध ने भी कुछ दिन रूककर माँ काली की तपस्या की थी, जिसका इतिहास वर्तमान से लगभग 2,500 साल पुराना है. 

इतिहासकारों के अनुसार पहली बार इस स्थान पर मंदिर का निर्माण पाल वंश के राजा महेंद्र पाल, जिनका राज बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में 895-910 ईस्वी के बिच था, ने करवाया था. 

Maa Bhdrakali Temple, Chatra

मंदिर परिषर

माँ भद्रकाली के मंदिर परिषर में माँ के मंदिर के अलावा राम-भक्त हनुमान जी की पंचमुखी मंदिर, राम जानकी मंदिर, बौद्धस्तूप, और भगवान शंकर के शहस्त्र शिवलिंग का मंदिर, जिसपर जल अर्पण करने से एक साथ 1008 शिवलिंग के ऊपर जल अर्पित करने का फल मिलता है, भी स्थित है. 

इतिखोयी से इटखोरी 

कहा जाता है की जिस दौरान गौतम बुद्ध यहाँ रूककर माँ काली की तपस्या कर रहे थे, उस समय एक दिन उनकी दत्तक माँ/मौसी महाप्रजापती गौतमी, जिन्होने उनकी माँ "महामाया" के देहांत के बाद उनका पालन पोषण किया था और जिनके नाम पे हीं भगवान बुद्ध का नाम गौतम भी पड़ा था, उन्हें वापस अपने घर लुम्बिनी, नेपाल, ले जाने के लिए आयी, परन्तु भगवान् बुद्ध ने उन्हें अपना मानने से इंकार करने के बाद वापस जाने से मना कर दिया, जिसपर महाप्रजापती गौतमी के मुँह से "इतिखोयी" शब्द निकला जिसका अर्थ हिंदी में "यहीं खो दिया" होता है, और इसी पर इस स्थान का नाम "इतिखोयी" पड़ गया और समय के साथ यह शब्द परिवर्तित होकर "इटखोरी" हो गया. 

इटखोरी महोत्सव 

साल 2015 से यहाँ के स्थानीय सांसद सुनील कुमार सिंह के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप झारखंड की राज्य सरकार यहाँ की संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को राष्ट्रीय पहचान देने के उद्देश्य से हर साल फरवरी माह में यहाँ राज्यकीय इटखोरी महोत्सव का आयोजन करती है. यह महोत्सव यहाँ के स्थानीय कलाकारों को देश के प्रसिद्ध कलाकारों के साथ मंच साझा करने और अपनी कला का प्रदर्शन करने का भी सुनहरा मौका प्रदान करता है. 

Maa Bhdrakali Temple, Chatra


दोस्तों आपको भी अगर कभी झारखण्ड जाने का मौका मिले तो इस मंदिर में माँ के दर्शन को जरूर जाएँ । 

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धन्यवाद्  


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