नारद मुनि के श्राप के कारण सहना पड़ा था भगवान् राम को माता सीता का वियोग, जानें क्या है पूरी कहानी ।

दोस्तों आज हम इस ब्लॉग के माध्यम से ये जानेंगे की कैसे नारद मुनि के श्राप के कारण सहना पड़ा था भगवान् राम को माता सीता का वियोग। रामचरितमानस में लिखी कथा के अनुसार एक बार नारद मुनि घूमते-घूमते हिमालय पर्वत की एक अत्यंत पवित्र, सुन्दर, और सुहावनी गुफा के पास पहुंचे, जहाँ गंगा जी की पवित्र धारा बह रही थी। उस सुन्दर स्थान को देखकर उनका मन मोहित हो गया, और वो वहीँ अपना आश्रम बनाकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु की तपस्या करने लगे। परन्तु नारद मुनि को दक्ष प्रजापति का श्राप था की वो एक स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं रुक सकते, वो हमेशा तीनों लोकों में घूमते रहेंगे। नारद मुनि का एक स्थान पर रूककर भगवान् की तपस्या करने से दक्ष के श्राप की गति भी रुक गयी और इधर इंद्र को भी ऐसा डर हुआ की देवर्षि नारद उसके निवास अमरावती का राज्य चाहते हैं। जिसके डर से इन्द्र ने कामदेव को बुलाकर किसी प्रकार उनकी तपस्या भंग करने का अनुरोध किया, जिसपर कामदेव अपनी सहायक सेना को लेकर नारद मुनि की तपस्या भंग करने को चल पड़े। 

वहां जाने पर कामदेव ने देवर्षि का ध्यान भंग करने के लिए अनेकों प्रकार की माया रची, परन्तु फिर भी वो नारद मुनि का ध्यान नहीं तोड़ पाए। देवर्षि नारद की श्री हरी की चरणों में अटल भक्ति को देखकर कामदेव को अपने किये के कारण उनके मन में भय की भावना उत्पन्न हुई, और उनका कुछ अहित न हो इस भय से वो अपनी गलती की क्षमा मांगने के लिए नारद मुनि के चरणों में याचना करने लगे, और नारद मुनि के द्वारा क्षमा किये जाने के बाद वो वापस लौट गए। इधर कामदेव पर विजय प्राप्त करने के बाद नारद मुनि के मन में अहंकार की भावना उत्पन्न हो गयी। तपस्या खत्म होने के बाद नारद मुनि भगवान् शिव के पास गए, और उन्हें कामदेव को जितने की सारी कथा सुनाई, और कहा की मैंने भी आपकी तरह माया पर विजय प्राप्त कर ली है। जिसपर भगवान् शिव ने उन्हें अपना प्रिय मानकर ये सुझाव दिया की, जिस तरह आपने कामदेव पर विजय प्राप्त करने की कथा मुझे सुनाई, इसे कहीं और मत सुनाईएगा, भगवान् विष्णु को तो भूलकर भी नहीं। 

भगवान् शिव से मिलने के बाद एक बार घूमते-घूमते नारद मुनि लक्ष्मीपति भगवान विष्णु के निवास स्थान क्षीरसागर को पहुंचे और वहां भगवान् शंकर की बातों का ध्यान न रखते हुए भगवान् विष्णु को कामदेव की माया पर विजय प्राप्त करने की सारी कहानी बताई। जिसपर श्री हरी ने मुस्कुराकर नारद मुनि को कहा - "आपके ध्यान मात्र से ही जब साधारण मनुष्यों के मन के अंदर की माया खत्म हो जाती है, तो आपका माया पर विजय प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं". जिसपर नारद मुनि ने भगवान् को यह कहा की ये सब तो आप ही की कृपा से संभव हो पाया है। 

परन्तु भगवान् विष्णु ने नारद मुनि के मन के अंदर उत्पन्न हुए अहंकार को देख लिया था और चुकी नारद मुनि भगवान् के परम भक्त थे और उनके अंदर उत्पन्न हुए अहंकार को ख़त्म करना उनका परम धर्म था, इसलिए उन्होंने माया रची और एक बहुत ही सुन्दर स्वर्ग के समान एक नगर का निर्माण किया जहाँ पर बसने वाले मनुष्य कामदेव और रति के समान सुन्दर थे, और उस नगर के राजा शीलनिधि, जिनका ऐश्वर्य भगवान् इंद्र के समान था, की अतिसुन्दर पुत्री विश्वमोहिनी के स्वयंवर की तैयारी चल रही थी। अनेकों राजा इस स्वयंवर में भाग लेने वहां आये हुए थे, इसि बिच देवर्षि नारद भी उस नगर को जा पहुंचे, और नगर घूमने के बाद जब वो राजा के दरबार में पहुंचे तो राजा ने उनका बहुत स्वागत सत्कार किया और अपनी पुत्री को बुलाकर देवर्षि से उसके दोष और गुणों के बारे में पूछा।  इधर देवर्षि नारद भगवान् की माया से वशीभूत होकर राजकुमारी की सुंदरता को देखते ही अपने वैराग्य को भूलकर उसपर मोहित हो गए और उनके मन में राजकुमारी से विवाह करने की प्रबल इक्षा जाग उठी, और राजा को यह बोलकर की आपकी पुत्री बहुत सुन्दर लक्षण वाली है, वहां से चल दिए । 

अब देवर्षि के मन में किसि प्रकार उस राजकुमारी को अपनी पत्नी बनाने की बात मन में चल रही थी, और उन्होंने इस कार्य में मदद के लिए अपने आराध्य श्री हरि का ध्यान किया, अपने परम भक्त नारद मुनि का ध्यान करते हीं भगवान साक्षात् नारद मुनि के सामने आ खड़े हुए। भगवान् को सामने देख नारद मुनि ने भगवान् से विनती कि की वो उन्हें अपनी सुंदरता प्रदान करें, जिससे स्वयंवर में वो राजकुमारी उसके रूप से मोहित होकर उन्हें ही अपना पति चुने, भगवान् कुछ ऐसा करें जिससे उनका भला हो जाये। जिसपर भगवान यह कहकर की "मैं वही करूँगा जिससे आपका भला हो" अंतर्ध्यान हो गए। इधर नारद मुनि माया के वश में भगवान् की बातों को नहीं समझ पाए और यह सोंचकर की अब तो उनका विवाह राजकुमारी से हो हीं जायेगा, वो स्वयंवर में भाग लेने चल पड़े। 

श्री हरी ने देवर्षि के कल्याण हेतु उनका मुख बंदरो के मुख के जैसा कुरूप कर दिया था, जिस बात से नारद मुनि अनजान थे, परन्तु ब्राह्मण के वेश में आये भगवान शंकर के दो गण प्रभु की सारी लीला जान रहे थे। राजकुमारी के स्वयंवर में जहाँ अनेकों राजा सज-धज कर स्वयंवर में भाग लेने पहुंचे थे, वहीँ नारद मुनि यह सोंचकर ख़ुशी से फुले नहीं समा रहे थे की यहाँ मुझसा सुन्दर कौन है, राजकुमारी तो मुझे देखते ही वरमाला मुझे ही पहनाएगी । इधर स्वयं भगवान् विष्णु भी उस स्वयंवर में राजा का रूप धारण कर भाग लेने आते हैं। राजकुमारी नारद मुनि के रूप को देखकर बहुत क्रोधित होती है और दुबारा उनके तरफ बिना देखे सभा में आगे बढ़ जाती है और और श्री हरि की सुंदरता पर मोहित हो वरमाला उन्हें ही पहना देती है, और भगवान् राजकुमारी को लेकर वहां से चले जाते हैं।  इधर नारद मुनि कुछ समझ नहीं पाते और परेशान हो जाते हैं, जिसपर भगवान शिव के दोनों गण जो ब्राह्मण के वेश में वहां थे, उन्हें आईने में अपनी सूरत देखने को कहते है।  

आईने में अपनी बन्दर जैसी सूरत देखने के बाद देवर्षि नारद के मन में बहुत क्रोध उत्पन्न आता है, और वह ये सोंचकर की आज या तो वो भगवान् को बहुत कठोर श्राप देंगे या उनके सामने ही अपने प्राणों का त्याग कर देंगे, भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ की ओर चल पड़ते हैं, तभी रास्ते भगवान् विष्णु, माता लक्ष्मी और उस राजकुमारी के साथ, नारद मुनि को मिल जाते हैं जिसपर भगवान् उनसे पूछते हैं की इस तरह व्याकुल होकर आप किधर जा रहे हैं । उस राजकुमारी को भगवान विष्णु के साथ देखकर उनका क्रोध और बढ़ जाता है और वो श्री हरी को बहुत प्रकार की बातें कहने के बाद उन्हें श्राप देते हैं की - "जैसा शरीर धारण कर तुमने मुझे ठगा है, मेरा श्राप है की तुम वैसा ही शरीर धारण करो, और जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री का वियोग दिया है, उस प्रकार तुम्हे भी स्त्री का वियोग हो और चुकी तुमने मुझे बन्दर सा मुख दिया है, तो वही बन्दर तुम्हारे दुःख में तुम्हारे सहायक होंगे ", जिस कारण भगवान् विष्णु को अपने राम अवतार में माता सीता के वियोग का दुःख देखना पड़ा था. 


God Ram


नारद मुनि के श्राप को सहर्ष स्वीकार करते हुए भगवान विष्णु ने जब अपनी माया खत्म की तो न ही माता लक्ष्मी वहां रही और न ही वो राजकुमारी, जिसपर देवर्षि नारद अत्यंत भयभीत होकर भगवान् की चरणों में गिर पड़े और बहुत प्रकार से विनती की और कहा की माया के वशीभूत होकर जो कठोर बातें मैंने आपसे कही वो असत्य साबित हो अब मेरे मन का अहंकार ख़त्म हो गया परन्तु अब हमारे पाप कैसे ख़त्म होंगे। जिसपर भगवान् ने उन्हें कहा की आपका श्राप तो सत्य होगा और ऐसी हीं हमारी इक्षा है, और चुकी आपने भगवान् शिव की बात न मानकर बहुत बड़ी गलती की, आप भगवान शिव को ही भजिये क्यूंकि भगवान शिव मेरे अत्यंत प्रिय हैं, बिना भगवान् शिव को भजे कोई मेरी भक्ति नहीं प्राप्त कर सकता।

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