सत्ता का अभिमान | A Story on Pride of Power

रात के 11 बजने को थे, विकास अभी तक अपने घर नहीं आया था, उसकी पत्नी प्रीति उसके आने इंतज़ार कर रही थी, तभी प्रीति को विकास का फ़ोन आता है की आज रात को वो घर नहीं आ पायेगा, प्रीति को उसने उसका इंतज़ार नहीं करने को कहा. दरअसल विकास चुनाव की तैयारियों में लगा था, चुनाव जो आने वाले थे. विकास मंत्री जी का ख़ास और वफादार था और क्षेत्र में भी उसकी व्यक्तिगत पकड़ अच्छी थी. क्षेत्र के लोग अपनी समस्या के लिए मंत्री जी के बजाय विकास के पास ही जाया करते थे, और वो उनलोगों की हरसंभव मदद भी करता। समाज के लोग उसके इसी व्यवहार के कारण उसे पसंद करते और उसके कहने पे ही वे लोग मंत्री जी को वोट भी देते थे. मंत्री जी को भी इस बात का एहसास था की विकास उनके लिए एक तुरुप के इक्के की तरह है, इसलिए वो विकास को खास महत्व देते थे, और क्षेत्र के सारे कामों को देखने की जिम्मेदारी भी उसी को ही दे रखी थी. 

चुनाव का समय आ गया, और इस बार भी मंत्री जी को विकास और उसके साथियों के कारण अच्छे खासे वोट मिले और वो चुनाव फिर से जित गए, मंत्री जी को फिर से मंत्रालय मिल गया और विकास भी पहले की तरह मंत्री जी के क्षेत्र के कामों को देखने लगा. पर मंत्री जी के मन में उनको बार-बार मिलने वाली जीत ने एक अभिमान को भी जन्म दे दिया था. एक दिन जब विकास अपने गाँव आया हुआ था तो गाँव के कुछ लोगों ने विकास से कहा - तू तो पुरे क्षेत्र का ख्याल रखता है, पर अभी तक अपने गाँव की नदी का पूल नहीं बनवा पाया। विकास ने उनलोगों को कहा - चिंता मत करो इस बार वापस जाते हीं मंत्री जी से इसका टेंडर पास करवाता हूँ. शहर वापस लौटने के बाद विकास सबसे पहले इसी काम के लिए मंत्री जी के पास गया, कुछ दिनों में मंत्री जी ने उसके गाँव के पूल के लिए फण्ड की घोषणा कर दी और विकास को कहा की ध्यान रहे ये टेंडर ब्रजेश को ही मिलना चाहिए। ब्रजेश मंत्री जी का छोटा भाई था और एक नामी ठेकेदार भी था और मंत्री जी के कारण उनके विभाग के ज्यादातर ठेके उसे ही मिलते थे और वो इसके लिए उन्हें कमीशन भी दिया करता था. 

Pride of Power Story

विकास मंत्री जी के बातों का बिना कुछ जवाब दिए वहां से चला गया, वह नहीं चाहता था की ब्रजेश को उसके गाँव के पूल का ठेका मिले, क्यूंकि ब्रजेश अपने भाई की पहुँच की वजह से ख़राब गुणवत्ता के काम या आधा अधूरा काम करके फण्ड के सारे पैसे गटक जाया करता था. विकास पहले भी कई बार मंत्री जी को उसके कामों की गुणवत्ता के बारे में बता चूका था, पर चूँकि मंत्री जी को ब्रजेश से पैसे मिलते थे, इसलिए वो हमेशा विकास की बातों का अनसुना कर दिया करते थे. लेकिन इस बार जब बात विकास के अपने गाँव के काम की थी, वो किसी भी सूरत पे ब्रजेश को इस ठेके से दूर रखना चाहता था. और उसने ऐसा किया भी, विभाग के इंजीनियर की मदद से उसने वो ठेका एक ईमानदार ठेकेदार को दिलवा दिया । 

इधर जब ब्रजेश को वो ठेका नहीं मिला, वो तिलमिलाया हुआ मंत्री जी के पास जा पहुंचा और मंत्री जी से बोला - "करवा दिया ना विकास ने आपको एक करोड़ का घाटा, और करो उसपे विश्वास उस पूल का ठेका तो उसने किसी और ठेकेदार को दिलवा दिया, इस टेंडर में पुरे दो करोड़ का नाफ़ा था". मंत्री जी ब्रजेश की बातों को सुनने के बाद पैसों की लालच में अंधे हुए बिना कुछ सोंचे समझे विकास के पास जा पहुंचे और उसे बहुत भला बुरा कहने के बाद अपने यहाँ से उसे निकाल दिया। मंत्री जी के इस व्यवहार से विकास को बहुत ठेस पहुंची और वो फ़ौरन वहां से अपने गाँव के लिए चल पड़ा. गाँव आने के बाद वो यही सोंचकर हमेशा चिंतित रहता की जिसके लिए वो दिन रात उतनी मेहनत करता था, वो थोड़े से पैसों की लालच में उसकी सारी ईमानदारी और वफादारी भूल गया. विकास ने अब फैसला कर लिया था की अब वो किसी भी नेता के लिए काम नहीं करेगा, और उसने गाँव में हीं अपना एक व्यवसाय शुरू किया। 

समय बीतता गया पर वो अपने काम में ध्यान नहीं लगा पा रहा था, वो अभी भी मंत्री जी के द्वारा किये गए व्यवहार को भुला नहीं पा रहा था. एक दिन विकास ने अपने मन की सारी बात अपने एक मित्र को बताई और कहा की मंत्री जी के द्वारा किये गए बेइज्जती का बोझ उससे नहीं उठाया जा रहा, पर वो करे भी तो क्या वो मंत्री जी का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकता। जिसपर उसके मित्र ने उसे अगले चुनाव में उसे मंत्री जी के खिलाफ खड़े होने को कहा, और बोला - चूँकि तेरी समाज में अच्छी पकड़ है और लोग तुझे पसंद भी करते हैं तो चुनाव तो तू जीत ही जायेगा और ऐसे तू मंत्री जी को अपनी बेइज्ज्ज़ती का जवाब भी दे देगा और आगे भी समाज के लिए काम भी करता रहेगा। विकास को अपने दोस्त की बात अच्छी लगी और उसने ऐसा ही करने का निर्णय लिया, और इसके लिए उसने अभी से हीं तैयारियां शुरू कर दी. 

धीरे धीरे समय के साथ विकास ने चुनाव की सारी तैयारी पूरी कर ली थी, इधर जब मंत्री जी को इस बात का पता चला की इस बार विकास भी उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाला है, उनके मन में विकास की सामाजिक पहचान के कारण हार का थोड़ा डर तो हुआ, पर फिर भी वो आश्वस्त थे की वो पैसे के दम पर इस बार भी चुनाव जित जायेंगे और उन्हें अपने पैसों पर घमंड भी था। जैसे जैसे चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा था, जनता के द्वारा विकास को मिल रहे समर्थन को देखकर उनका आत्मविश्वास भी कम हो रहा था, और एक समय ऐसा भी आया की उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया की वो इस बार का चुनाव विकास के हांथों हार जायेंगे. 

इधर जहाँ विकास को अपनी जीत सामने दिखने लगी थी, वहीँ दूसरी तरफ मंत्री जी अपने जीत के लिए ओछी राजनीति करने को उतारू हो गए, और वो अब इसके लिए हर प्रकार के पैतरे लगा रहे थे, उन्होंने विकास को चुनाव न लड़ने के लिए बहुत प्रकार का प्रलोभन भी दिया, पर हर प्रकार से असफल होने के बाद मंत्री जी ने विकास को, जो अब उसके रास्ते का कांटा बन चूका था, अपने रास्ते से हटाने की सोंची और उन्होंने विकास को मरवाने के लिए उसपे जानलेवा हमला करवाया, पर विकास उस हमले में बाल-बाल बच गया. विकास पे हमले की खबर क्षेत्र में आग की तरह फ़ैल गयी, और अब जो थोड़े बहुत वोट मंत्री जी को मिलने वाले थे वो भी उनके हाथ से चले गये. चुनाव में उन्हे विकास के हांथों करारी हार का सामना करना पड़ा. विकास से हार जाने के बाद मंत्री जी का राजनितीक जीवन पूरी तरह ख़त्म हो चूका था, विकास अब हर बार अपने काम के बदौलत चुनाव जीत जाता था. और एक समय ऐसा भी आया की विकास के हैसियत के सामने उस मंत्री की हैसियत बहुत बौनी पड़ चुकी थी और वो अपना जीवन यापन भी विकास की मेहरबानी से ही किया करता था और वो विकास के प्रति किये गए व्यवहार पर भी बहुत शर्मिंन्दा था, पर वो कभी विकास के सामने जाकर अपनी गलती की माफ़ी मांगने की हिम्मत नहीं कर पाया। 

दोस्तों इस कहानी से हमे दो शिक्षा मिलती है: पहला यह की जो आपके प्रति ईमानदार और वफादार हो, उसका महत्व हमेशा अपने निजी स्वार्थ से ज्यादा देना चाहिए और दूसरा की भाग्य आपको जितनी भी ऊंचाई पर ले जाए, पर जहाँ से भी आपके मन में अभिमान का बीज पनपना शुरू होगा वहीँ से आपके पतन की कहानी भी शुरू हो जाएगी. 

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धन्यवाद् 


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