भारत की आजादी के 2 बड़े नायक - जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजाकर रख दी थी ।

दोस्तों, जैसा की हम सभी जानते हैं की अंग्रेजों की लगभग 200 साल की ग़ुलामी के बाद हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। परन्तु आजादी के इस ईमारत की नींव हजारों देशभक्तों के शहादत पर रखी गयी है। अपनी मातृभूमी को अंग्रेजों के ग़ुलामी से आजादी दिलवाने के लिए किसी को अंग्रेजों की गोलियों का सामना करना पड़ा तो किसी को जिन्दा जलाया गया या किसि को फांसी दे दी गयी, फिर भी भारत माँ के वीर सपूतों का अपनी मातृभूमि को आजाद करवाने का जज्बा कभी भी कम नहीं हुआ, और वो अविरत अंग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी के लिए अपने जानों की बाजी लगाते रहे । सन 1857 में शुरू हुई आजादी की लड़ाई लगभग 90 साल तक चली और अंत में अंग्रेजों को भारत माँ के वीर सपूतों के दृढ इक्षाशक्ति के सामने अपनी हार माननी ही पड़ी और हमारा देश 15 अगस्त 1947 को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ।

दोस्तों मैं आज के इस ब्लॉग पोस्ट में भारत माँ की आजादी के लिए शहीद हुए हज़ारों क्रांतिकारियों में से उन दो नायक -  भगत सिंह और पंडित चन्द्रशेखर आजाद  - के बारे में लिखने जा रहा हूँ, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजाकर रख दी थी और जिनका भारत की आजादी में एक महत्वपूर्ण  योगदान रहा ।


पंडित चंद्रशेखर आजाद 

23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गाँव में पंडित सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के यहाँ एकलौते पुत्र के रूप में पंडित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। पंडित चन्द्रशेखर आजाद बचपन से ही एक मेधावी छात्र और अचूक निशानेबाज थे। सन 1919 में हुए जालियांवाला बाग़ हत्याकांड के कारण देश के युवाओं के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग और तेज हो चुकी थी, और चन्द्रशेखर आजाद भी इससे अछूते नहीं थे। 

जालियांवाला बाग़ के जवाब में 1920 में महात्मा गाँधी के द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन में महज 14 साल की उम्र में ही चंद्रशेखर आजाद भी सड़कों पर उतर आये और इस आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, और इसी दौरान पहली बार उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी - दोस्तों कहा जाता है की अंग्रेजों के द्वारा उन्हें गिरफ्तार करने के बाद जब उन्हें कोर्ट में लाया गया, तब उनसे उनकी सुनवाई कर रहे जज ने उनसे उनका नाम पूछा था, जिसपर चंद्रशेखर आजाद ने बुलंद आवाज में कहा - मेरा नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता, और घर जेल है।  चंद्रशेखर आजाद का जवाब सुनने के बाद जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई थी। कहा जाता है की जज के आदेश पर जब आजाद को उनके नंगे बदन पर कोड़ों से मारा जा रहा था, तब हर कोड़ों के साथ उनके "वन्दे मातरम" का नारा और भी बुलंद होता जाता था। दोस्तों इसी घटना के बाद वो आजाद के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। 


चंद्रशेखर आजाद


असहयोग आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुई चौरी चौरा कांड के बाद जब गाँधी जी ने 1922 में बिना किसी से चर्चा किये हुए अपना आंदोलन वापस ले लिया था, तब चंद्रशेखर आजाद ने कांग्रेस से अपना रिश्ता ख़त्म कर लिया और 1924 में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और शचींद्रनाथ सान्याल के साथ मिलकर एक क्रांतिकारी दल "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" की नींव रखी। 

सन 1925 में अपने आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए चंद्रशेखर आजाद ने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, और अन्य साथियों के साथ मिलकर काकोरी कांड को अंजाम दिया, जिसमे अंग्रेजों के खिलाफ भीषण विद्रोह करने की मंशा से एक पैसेंजर ट्रेन में जा रही अंग्रेजों के खजाने को काकोरी में लूट लिया गया था। इस घटना के बाद रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ समेत उनके 40 साथीयों को पकड़कर अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा फांसी की सजा दी गयी, परन्तु चंद्रशेखर आजाद को अंग्रेजी हुकूमत नहीं पकड़ पायी, वो अभी भी आजाद थे । 

रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य साथियों के शहीद हो जाने के बाद 8 सितम्बर 1928 को चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और देश के अन्य क्रांतिकारि साथियों के साथ मिलकर दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में आयोजित हुई गुप्त सभा में सर्वसम्मति से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का नाम "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" रखा, जिसमे भगत सिंह संगठन के प्रचार प्रमुख और चन्द्रशेखर आज़ाद सेना प्रमुख बने। इस दिन बने इस नए संगठन का नारा था - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी, और वह फैसला है जीत या मौत।" 

27 फरवरी 1931 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में जब चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ आगे के आंदोलन की योजना बना रहे थे तभी ढेरों की संख्या में अंग्रेजी हुकूमत की पुलिस वहां आ पहुंची, जिसके बाद चंद्रशेखर आजाद ने अकेले ही उनसे भीषण युद्ध किया और तीन पुलिस वालों को अपनी जान से हाँथ धोना पड़ा, पंडित जी ने अकेले ही सबके दांत खट्टे कर दिए थे, अंत में जब पंडित जी के  बन्दूक में आखिरी गोली बची तब वो अपने आजीवन आजाद रहने वाले प्रण - दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे - को याद करते हुए अपने बन्दूक की अंतिम गोली में खुद का नाम लिखते हुए खुद को मारकर मातृभूमि के लिए शहीद हो गए।  दोस्तों कहा जाता है की उनके मरने के बाद भी कुछ समय तक अंग्रेजी हुकूमत का कोई पुलिस अधिकारी उनके पार्थिव शरीर को छूने तक की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, इतना खौफ पंडित जी ने देश के दुश्मनों के मन में भर रखा था। 


भगत सिंह

दोस्तों भगत सिंह संधू या भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रान्त के लायलपुर जिले के बंगा नामक गाँव में पिता किशन सिंह संधू और माता विद्यावती कौर के यहाँ हुआ था। जब वो महज 12 साल के थे तभी 13 अप्रैल 1919 को हुए जालियांवाला बाग़ में अंग्रेजों के द्वारा किये गए भीषण नरसंहार ने उनके जीवन पर बहुत गहरा असर डाला था, जिसके बाद से ही वो अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 

17 नवंबर 1928 को साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन में लाठी चार्ज से लगी चोट के कारण हुई लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पंडित चन्द्रशेखर आजाद और राजगुरु के साथ मिलकर अंग्रेजी सरकार के ASP सांडर्स की हत्या कर दी थी ।


भगत सिंह


8 अप्रैल 1929 को अंग्रेजों के सामने भारत के आजादी की आवाज बुलंद करने के उद्देश्य से उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ अंग्रेजों की केन्द्रिय असेंबली में किसी को नुकसान नहीं पहुँचे ऐसा सोंचकर एक खाली जगह पर बम फेंका था, जिससे पूरी असेंबली धुंए से भर गयी थी। वह चाहते तो इस घटना के बाद वो वहाँ से भाग सकते थे, परन्तु उन्होंने इंकलाब के नारे को बुलंद करते हुए अंग्रेजी हुकुमत को अपनी गिरफ्तारी दी और जिसके परिणामस्वरुप उन्हें उनके दो और साथियों, सुखदेव और राजगुरु, के साथ 23 मार्च 1931 को महज 24 साल की उम्र में लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी की सजा दी गयी, दोस्तों कहा जाता है की उन तीनों ने फांसी के फंदे को भी मुस्कुराकर अपने गले से लगाया था और हँसते हँसते अपनी मातृभूमी के लिए शहीद हो गए ।

दोस्तों उनकी वीरता का अंदाजा 3 मार्च 1931 को अपनी फांसी से पहले अपने भाई कुलतार सिंह को पत्र में लिखी बात से लगाया जा सकता है , जिसमे उन्होने लिखा था -
 
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुक़ाबला करें ।

दोस्तों, भगत सिंह ने जेल के दिनों में अंग्रेजी हुकूमत को लिखे पत्र में यह मंशा जताई थी की उन्हें युद्धबंदी समझकर फांसी के सजा की जगह गोली मार दी जाये, ऐसे दिलेर थे भगत सिंह। 

Post a Comment

0 Comments