अमर शहीद क्रान्तिकारी पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' की सम्पूर्ण जीवनी | Pandit Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

दोस्तों, देश की आजादी के लिए देश के नौजवानों में सरफ़रोशी की तमन्ना को जागृत करने वाले महान क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का जीवन संघर्षों से भरा था। 11 जून 1897 को जन्मे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल एक दिलेर स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा अव्वल दर्जे के देशभक्त कवि भी थे, उनकी रचित हर कविता देश भक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। अब आईये इस महान क्रांन्तिकारी के जीवन को विस्तृत्त रूप से जानते हैं ।

Pandit Ram Prasad 'Bismil'

पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के पूर्वज 

पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' के पूर्वज मध्य प्रदेश के ग्वालियर रियासत के तोमर घऱ गाँव में  रहते थे। उनका परिवार बहुत ही गरीब था, और थोड़े बहुत जमीन की खेती की उपज से किसी तरह उनके दादाजी पंडित नारायण लाल एक संयुक्त परिवार में अपना और अपने परिवार का गुजारा करते थे। पंडित नारायण लाल अपने बड़े भाई के आज्ञाकारी थे और अपने बड़े भाई की बहुत इज्जत करते थे। आभाव में भी पंडित नारायण लाल अपने संयुक्त परिवार के साथ एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे। परन्तु पंडित नारायण लाल जी के सीधे व्यवहार और बड़ों के प्रति सम्मान किये जाने का उनकी भाभी गलत फायदा उठाकर उनसे और उनके बच्चों से गलत व्यवहार किया करती थी। 

कुछ समय के बाद पंडित नारायण लाल जी ने अपनी भाभी के व्यवहार से दुखी होकर घर से अलग गाँव छोड़कर कहीं दूर जाकर अपने दम पर अपने परिवार का भरणपोषण करने का विचार बनाया और अपने भैया और भाभी से आशीर्वाद लेकर घर से बिना कुछ लिए अपनी पत्नी और दो बेटे मुरलीधर और कल्याणमल के साथ गाँव छोड़कर निकल पड़े। चार दिनों तक भूखे प्यासे भटकने के बाद पंडित नारायण लाल जी अपने परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर पहुंचे, जहाँ एक किसान ने उनकी आपबीती सुनने के बाद उन पर दया कर उनको और उनके परिवार को भोजन करवाया और उन्हें उसी गाँव में रहने का भी आग्रह किया। 

पंडित नारायण लाल जी भी अपने परिवार के साथ उसी गाँव में रहने लगे और धीरे-धीरे गाँव वाले उनकी विद्वता से प्रभावित होने लगे, और पूरा गाँव उन्हें अपना पुरोहित मानने लगा। यहाँ पंडित नारायण लाल जी पंडिताई से अपने परिवार का जीवकोपार्जन करने लगे, और एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे। परन्त्तु दुर्भाग्य ने उनका साथ यहाँ भी नहीं छोड़ा, कुछ समय के बाद वहां भयंकर आकाल पड़ा, जिसके कारण पंडित नारायण लाल जी को पंडिताई में गाँव वालों से अनाज मिलने बंद हो गये, और कुछ समय में ही उनके परिवार पर भोजन की समस्या फिर से खड़ी हो गयी। इन सब चीजों से परेशान होकर पंडित जी ने शाहजहाँपुर कस्बे में एक दुकानदार के यहाँ 3 रूपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी कर ली, परन्तु 4 लोगों के परिवार में 3 रूपये से क्या होता, पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' की दादी किसि तरह आधे पेट खाकर उस 3 रूपये में अपने बच्चों के पेट भरने की असफल कोशीश करती पर ऐसा संभव कहाँ था, अंत में उन्होंने भी दूसरों के घर में अनाज पिसने का काम करना शुरू किया। 

इतनी दयनीय स्थिति होने के बाद भी पंडित नारायण लाल जी ने कभी हिम्मत नहीं हारी और वो दिन रात उस दूकान में मेहनत करते, धीरे धीरे उस दुकानदार की बिक्री अच्छी होने लगी और उसने पंडित जी का वेतन 7 रूपये प्रति माह कर दी।  5 वर्ष तक उस दुकानदार के यहाँ नौकरी करने के बाद जब पंडित जी की आर्थिक स्थिति ठीक हो गयी तब उन्होंने उसी कस्बे में अपना व्यवसाय शुरू किया, और उनके जीतोड़ मेहनत की वजह से उनका व्यवसाय भी अच्छा चलने लगा। कुछ समय के बाद पंडित जी ने शाहजहाँपुर में अपना मकान भी ले लिया। 

कुछ समय बीतने के बाद पंडित जी ने अपने बड़े बेटे पंडित मुरलीधर, जिनकी उम्र उस वक़्त 16 साल रही होगी, की शादी का विचार बनाया, जिसके बाद मुरलीधर की शादी मूलमती देवी से कर दी गयी। पंडित मुरलीधर के 4 बेटे और 5 बेटियां हुई, परन्तु उनमे से 2 बेटे और 3 बेटियां ही जीवित बचे, बाकियों का असमय निधन हो गया था। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल पंडित मुरलीधर और मूलमती देवी की दूसरी संतान थे। 

पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का बचपन

दोस्तों पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का जन्म मैनपुरी, जो उनका ननिहाल था, में 11 जून 1897 को ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ था। पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में अपने बचपन की एक कहानी का जिक्र किया है, जो इस प्रकार है-  पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के जन्म से पहले उनकी माता मूलमती देवी को एक और पुत्र हुआ था, जिसकी मृत्यु उसके जन्म के कुछ समय के बाद ही हो गयी थी, जिस वजह से पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के जन्म के समय उनके माता पिता बहुत डरे हुए थे, और उन्होंने इनके जीवन की रक्षा के लिए कई उपाय अपनाये, परन्तु होनी को कौन टाल सकता है। जन्म के 2 महीने के बाद राम प्रसाद 'बिस्मिल' बीमार हो गए और उनका शरीर सुखकर पिला पड़ने लगा, कई वैद्य और हाकिम को दिखाने और कई प्रकार की दवाईयां देने के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। उसी दरम्यान एक फ़क़ीर के बताने पर जब उनकी माँ ने एक खरगोश को उनके शरीर के चारों ओर घुमाकर उसे जमीन पर रखा, तभी उस खरगोश की तत्काल मृत्यु हो गयी और पंडित राम प्रसाद जी की तबियत में धीरे - धीरे सुधार होने लगा। 

सात वर्ष की उम्र में पंडित जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रारम्भ की और उन्होने हिंदी की शिक्षा अपने पिता पंडित मुरलीधर से ली, उसके बाद उर्दू की शिक्षा के लिए वो एक मौलवी साहब के पास मकतब जाने लगे। चौदह साल की उम्र में गलत संगत के कारण पंडित जी बुरी आदतों के शिकार हो गये, उन्हें सिगरेट, भांग, व निम्नस्तरीय उपन्यास पढ़ने की आदत लग गयी, जिसकी पूर्ति के लिए उन्हें ज्यादा पैसों की भी जरुरत होने लगी और इसके लिए वो अपने ही घर में चोरी किया करते थे। एक बार जब भांग के नशे में वो घर के संदूक से पैसों की चोरी कर रहे थे, तभी उनकी माँ ने उन्हें चोरी करते देख लिया जिसके बाद उन्हें अपने पिता से खूब मार पड़ी। बाद में पंडित जी की बुरी संगत छूटने के बाद धीरे-धीरे उनकी बुरी आदतें भी छूट गयी, और उनका मन पढाई में लगने लगा। 

पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' का क्रांतिकारी जीवन 

राम प्रसाद 'बिस्मिल' आर्य समाज की विचारधारा से प्रभावित थे, 1915 में शाहजहांपुर में इनकी मुलाकात आर्य समाज उपदेशक स्वामी सोमदेव से हुई और इनके सानिध्य में राम प्रसाद के जीवन की दिशा बदलने लगी। राम प्रसाद का देश के प्रति अटूट प्रेम और उनके मन में क्रन्तिकारी भावनाओं को देखने के बाद स्वामी सोमदेव ने पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' को अपना रिवाल्वर यह कहकर दे दिया की ये तुम्हारी रक्षा और आजादी के लड़ाई में तुम्हारे काम आएगा। 

1915 में जब लाहौर षड्यन्त्र केस में भाई परमानन्द को फांसी की सजा सुनाई गयी, तब इस समाचार को सुनने के बाद राम प्रसाद ने अंग्रेजों के साम्राज्य को अस्तित्व विहीन करने की कसम खायी। जिसके बाद 1916 में उन्होंने कांग्रेस के नेता पंडित जगत नारायण 'मुल्ला'  के आदेश के खिलाफ जाकर लखनऊ में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की शोभा यात्रा निकाली, जिसके बाद देश के युवा उनकी दृढ इक्षाशक्ति से बहुत प्रभावित हुए। इसी साल राम प्रसाद ने स्वामी सोमदेव के साथ मिलकर "अमेरिका की स्वतन्त्रता का इतिहास" नामक पुस्तक का प्रकाशन किया, जिसे छपने के बाद तुरंत अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा जब्त कर लिया गया था। 

मैनपुरी षड़यंत्र 

1916 में हीं पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने पंडित गेंदालाल दीक्षित के निर्देशानुसार "मातृवेदी" नामक संगठन की  सदस्यता ली, और दल को मजबूत करने के लिए धन संचित करने के उद्देश्य से 1918 में तीन डकैतियां डाली गयी। इधर पंडित गेंदालाल दीक्षित, जो इटावा जिले के ओरैया में DAV स्कूल के अध्यापक थे, के मन में जब क्रन्तिकारी भावना का उदय हुआ तब उन्होंने "शिवाजी समिति" नामक  संगठन का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य शिवाजी की तरह दल बनाकर लोगों से पैसे वसूलना और हथियार खरीदना था, बाद में राम प्रसाद ने भी अपने दल मातृवेदी का विलय इस दल में कर दिया था। एक बार पंडित गेंदालाल दीक्षित धन वसूलने के उद्देश्य से कई लोगों के साथ कही जा रहे थे, और रात को इस दरम्यान बिच में कहीं रुकना पड़ा, इधर किसी मुखबीर ने पुलिस को इन लोगों के रुकने की सुचना दे दी। जिसके बाद पुलिस ने उनलोगों को चारों तरफ से घेर लिया और दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी हुई, परन्तु इस घटना में पंडित गेंदालाल दीक्षित को उनके अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 

इधर पंडित गेंदालाल दीक्षित के गिरफ्तार होने के बाद संगठन में आपसी मतभेद हो गए, जिसका फायदा उठाकर दल के एक सदस्य, जो मैनपुरी का था, ने अपना एक अलग संगठन बना लिया और धन की व्यवस्था के लिए दल के हि एक अन्य सदस्य, सोमदेव शर्मा, को उसे अपने ही घर में डकैती करवाने का आदेश दिया। जब सोमदेव शर्मा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उसे हत्या की धमकी दी गयी, जीसपर सोमदेव ने गुस्से में आकर पुलिस को सारी बातें बता दी, जिसका फायदा उठाते हुए पुलिस ने दल के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया और कईयों के ऊपर केस दर्ज कर उन्हें अभियुक्त बनाया गया, जिसमे पंडित राम प्रसाद बिस्मिल भी थे, परन्तु पुलिस इन्हे गिरफ्तार नहीं कर पायी।  इस घटना को मैनपुरी षड्यंत्र का नाम दिया गया। 

भूमिगत गतिविधियां

मैनपुरी षड्यंत्र के बाद राम प्रसाद फरार हो गये और साल 1919 और 1920 के दरम्यान उत्तर प्रदेश के कई स्थानों को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया।  इस दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने "बोल्शेविकों की करतूत" और "यौगिक साधन" जैसे उपन्यास का हिंदी अनुवाद भी किया। 

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन 

अक्टूबर 1924 में सशस्त्र संघर्ष के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेकने के उद्देश्य से रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, शचींद्रनाथ सान्याल, और  योगेश चन्द्र चटर्जी जैसे युवा क्रांतिकारियों ने मिलकर "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" नामक संगठन की स्थापना की, जिसका नेता राम प्रसाद बिस्मिल को चुना गया। 

काकोरी काण्ड

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का आंदोलन जैसे जैसे आगे बढ़ता गया उसके साथ ही आंदोलन को व्यापक रूप देने के लिए धन की भी ज्यादा आवश्यकता होने लगी, जिसके लिए 1924 से 1925 के बिच संगठन के सदस्यों के द्वारा कुछ अमीरों के यहाँ डकैतियां डाली गयी परन्तु इस डकैती में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो जाने के कारण पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने निर्णय लिया की अब सिर्फ सरकारी खजाने को ही लुटा जाएगा। 


जिसके बाद संगठन के सदस्यों के द्वारा 7 अगस्त 1925 को एक तत्काल मीटिंग बुलाकर ट्रेन में जानेवाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनायीं गयी। योजना के अनुसार 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल के साथ चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा, और बनवारी लाल शाहजहांपुर स्टेशन पर सहरानपुर से लखनऊ जाने वाली पैसेंजर ट्रैन, जिसमे अंग्रेजी हुकूमत का खजाना था, में सवार हुए और काकोरी स्टेशन के बाद जब ट्रेन आगे बढ़ी तब इसकी चैन खिंचकर इसे रोक दिया गया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी बक्शे को निचे गिराकर खजाने को लूट लिया गया। इस डकैती में गलती से मन्मथनाथ गुप्त के हांथों माउजर की ट्रिगर दबने से एक मुसाफिर की मौत हो गयी थी।


काकोरी की इस घटना को अंग्रेज सरकार ने बहुत गंभीर मामला मानकर इसकी जाँच गहनता से कारवाई जिसके बाद सितम्बर 1925 में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की गिरफ्तारी हो गयी और इनपर डकैती, हत्या, आपराधिक षड़यंत्र, सरकार के खिलाफ जिहाद छेड़ने जैसी धाराओं पर मुकदमा चलाया गया, और अंत में 6 अप्रैल 1927 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी। राम प्रसाद को फांसी की सजा होने के बाद देश की क्रांति ने और गति पकड़ ली जिसकी कमान चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, और राजगुरु जैसे वीरों ने संभाली।


Poem by Ram Prasad Bismil



जीवन का अंतिम समय 

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने अंतिम दिनों में जेल में ही अपनी आत्मकथा और कई देशभक्ति कवितायेँ लिखी, जिसे वो अंग्रेजों से छुपाकर एक एक पन्नों में लिखकर जेल से बाहर भेजा करते थे। जेल में वो अक्सर बिस्मिल अज़ीमाबादी के द्वारा लिखी हुई देशभक्ती की भावना से भरी कविता - "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है?" - गुनगुनाया करते थे, यह कविता इनके ही द्वारा गाये जाने के बाद प्रसिद्ध हुई थी। 

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को फांसी होने वाली थी, उससे पहले 18 दिसंबर 1927 को उनके माता-पिता उनसे आखिरी मुलाकात को गोरखपुर जेल में आये। अपनी माँ को नजरों के सामने देख राम प्रसाद की आँखों में आंसू आ गये, जिसपर उनसे उनकी माँ ने पूछा की ये तुम्हारे आँखों में आंसू कैसे, क्या तुम मौत से डर गए? जिसपर राम प्रसाद बिस्मिल ने जवाब दिया की ये तुम्हारी चरणों को समर्पित श्रद्धा के आँशु हैं और कल अख़बारों में पढ़ लेना की किस शान से तेरा बेटा फांसी के फंदे को गले लगाता है, ऐसी दिलेरी थी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के अंदर। 

उसी दिन भगत सिंह के मित्र शिव वर्मा राम प्रसाद बिस्मिल को जेल से छुड़ाने के प्रयास से उनसे मिलने आये थे, वो कुछ कहते ही की पुलिस ने उन्हें बोला की मिलने का समय पूरा हो गया  है, जिसके बाद राम प्रसाद जी ने उन्हें एक स्वरचित कविता दी, जिसके बाद वो पुलिस वाले के साथ बाहर आ गए। वो कविता कुछ इस प्रकार थी: 

मिट गया जब मिटने वाला, फिर सलाम आया तो क्या।

दल की बर्बादी के बाद, उनका पयाम आया तो क्या।


मिट गईं सारी उम्मीदें, मिट गए सारे ख्याल।

उस घड़ी गर नामवर, लेकर पयाम आया तो क्या।

 

ऐ दिले नादान मिट जा अब तू कूच-ए-यार में।

फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या


काश ! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते

बरसरे तुरबत कोई महशर खराम आया तो क्या


आख़िरी शव दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प

सुबह दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या


30 वर्ष की उम्र में 19 दिसंबर 1927 को सुबह 6:30 बजे गोरखपुर जेल में पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी को फांसी दे दी गयी। शत बार नमन है भारत माँ के ऐसे वीर सपूत को। 


तलवार खून से रंग लो, अरमान रह न जाए । 

बिस्मिल के सर पर कोई अहसान रह न जाए ।

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