!! मन का भ्रम !!

 गूंजती है कानों में जब, किसी के पायलों की खनक 

ऐसा लगता है की, वो आ रही है !

जैसे रेगिस्तान के आसमान पे, 

घनी बदली सी छा रही है !!

फिर मन कहता है, 

कहीं कोई और तो नहीं !

समझाता हूँ उसको, 

उसके सिवा कहाँ और कोई !!

वो ही है रास्ता, 

वो ही है मंजिल !

उसने ही सांसे दी, 

वो ही है कातिल !!

चाहा नहीं कभी, 

उसके सिवा किसी और को !

ये मालुम है, 

इस जालिम संसार को !!

तो कैसे कोई और आएगा, 

मेरी जिंदगी में ऐ मन !

जबकि है मेरा उससे, 

एक अटूट बंधन !!

मन का भ्रम

फिर सोंचा, अगर वो नहीं, 

तो ये कैसी अनजानी आवाज !

जिसके सुनने से बज जातें है ,

मेरे दिल के साज !!

पर ये कुछ और नहीं,

उसकी यादों का गम था !

और ये मेरे जीवन का, 

सबसे बड़ा भ्रम था !!

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