!! द्वापर में केशव की लीला !!

द्वापर में केशव की लीला....


सृजन सृष्टि का हुआ है जिससे...

जो जगत के पालनहार हैं !

वो मनमोहन, श्री कृष्ण, गोपाल...

विष्णु की अवतार हैं  !!

किया वचन पूरा विष्णु ने...

बनकर देवकी की संतान !

किया वध कंस-रुपी राक्षस का...

वसुदेव का लौटाया सम्मान !!

नन्द वंश में पले बढे...

हुए यशोदा के नन्दलाल !

किया यमुना को पुनः पवित्र...

मर्दन कर कालिया-रुपी काल !!

पवित्र प्रेम उनका राधा संग...

बन गया मोहब्बत की मिशाल !

धून उनके बांसुरी की ऐसी...

जैसे कोई मायाजाल !!

अब तक तो मेरे मोहन ने...

अपना बचपन ही बिताया था !

की महाभारत की लीला का... 

अब असली समय आया था !!

की परेशान थे पाण्डुपुत्र...

दुर्योधन के व्यवहार से !

मची थी त्राहि हस्तिनापुर में...

कौरवों के अत्याचार से !!

तभी पांडवों को जाकर...

जगतपति का साथ मिला !

निराश हो चुके धर्माधिराज को...

गिरिधारी का हाथ मिला !!

फिर गांधारी के भ्राता ने...

चल दी ऐसी टेढ़ी चाल !

किया आयोजन द्यूत-क्रीड़ा का...

रचा बहुत ही घातक जाल !!

ये चाल फिर से शकुनी का...

कौरवों को आया बहुत ही काम !

हारकर इस खेल को पांडव...

घर से निकल पड़े वनधाम !!

इसी खेल में दुःशासन ने...

चीरहरण द्रौपदी का किया !

मौन थे जब महारथी सारे...

केशव ने उसका साथ दिया !

लौट हस्तिनापुर जब पांडव..

आये कर ख़त्म अज्ञातवास !

तब केशव ने दिया संदेशा...

जाकर दुर्योधन के पास !!

दुर्योधन अब न्याय करो...

दे दो पांडवों का अधिकार !

जी सकें चैन से वो भी...

और बचा रहे आपसी प्यार !!

सुनकर बातें मोहन की...

दुर्योधन क्रोध से भर आया !

कैद कृष्ण को करने का...

हुक्म सैनिकों को सुनाया !!

दुर्मति देख दुर्योधन की...

भगवान क्रोध से लाल हुए !

देख अचम्भित रह गया वो मूरख...

जब ईश्वर, केशव से काल हुए !!

देख विलीन ब्रह्माण्ड को उनमे...

काँप उठा दुर्योधन का मन !

थर्रा उठी पूरी धरती...

जब प्रत्यक्ष हुआ, महाभारत का रण !!

युद्धघोष कर निकले माधव...

जब हस्तिनापुर की सभा से !

की जगमगा उठा था सारा जहाँ...

जगतपति की प्रभा से !!

निश्चित था अब महासंग्राम... 

अब निश्चित महासमर था !

तय था कौरवों का विनाश...

तय अब कुदरत का कहर था !!

कुरुक्षेत्र की धरती पर...

दृश्य काल का विकराल था !

की चमक रही थी तलवारें...

 रंग हो चूका माटी का लाल था !!

की हो चुकी भीम के हांथों..

दुर्योधन की कहानी तमाम थी !

की हर्ष ही हर्ष था चारों तरफ...

वो खुशियों भरी शाम थी !!

की अधर्म पे धर्म की...

विजय पताका लहरा चुकी थी !

की द्वापर में केशव की लीला...

अपना रंग दिखला चुकी थी !!

की हुआ था राजतिलक...

पांडवों के सत्कर्म का !

की हुआ फिर से मही पर...

एकक्षत्र राज धर्म का !! 

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