!! लीला प्रभु श्री राम की !!

लीला प्रभु श्री राम की...

 

थे मार्यादा की जो मिशाल..

मानवों में जो सबसे उत्तम थे !

दशरथ नन्दन, कौशल्या पुत्र...

वो राम मेरे पुरषोत्तम थे !!

जला चिराग पुनः रघुकुल में...

शत्रुघ्न, भरत, लखन बन्धुगण थे !

की विष्णु की सप्तम अवतार...

ले कर आये रघुकुलनंदन थे !! 

किया ग्रहण शिक्षा वशिष्ट से...

फिर विश्वामित्र का संग पाया !

वध किया ताड़का का प्रभु ने...

दिखलाई जग को अपनी माया !!

कर कुछ मानव हित कार्य प्रभु...

पहुंचे गुरु संग मिथला धाम !

जनकसुता संग ब्याह रचाया...

हुए मैथिलि के श्री राम !!

खबर राम के विवाह की सुनकर...

खुश थे जग के हर नर नारी !

की झूम रहा था देवलोक...

की झूम रही थी धरती सारी !!

दशरथ ने भी इस उत्सव में...

चार चाँद लगवाया !

घोषणा राम के राजतिलक की...

अयोध्या में करवाया !!

तभी अचानक कालचक्र ने...

उलटी करवट खाई !

केकयी के शयन कक्ष में...

मंथरा दासी आयी !!

सुनकर बातें मंथरा की...

केकयी का मन भरमाया !

की अवध की खुशहाली में...

ईर्ष्या ने ग्रहण लगाया !!

मिला भरत को राज-काज...

और प्रभु को, मिला वनवास !

सुनकर इस दुःखद घटना को...

सम्पूर्ण अवधपुर हुआ उदास !!

वनवासी रूप देख प्रभु का...

भर आयी आँखें जन जन की !

वन को निकल पड़े श्री राम...

संग चले थे लखन, जानकी !!

तीनो लोक के स्वामी देखो...

कैसे वन वन फिरते हैं !

तपता बदन सूरज की ताप से...

पैरों में कांटे चुभते हैं !!

फिर भी राम, लखन, और सीता...

मुख से न कभी उफ़ कहते हैं !

दिया जो भी कष्ट नियति ने...

वो हंसकर हर दुःख सहते हैं !!

की एक दिन दुष्टा शूर्पणखा को...

लखन को वरणे का आया मन !

की कटवाया उसने नाक अपना...

की मारे गए खर-दूषण !!

सुन शूर्पणखा से सारा वृतांत...

रावण क्रोध से भर आया !

की रचकर उसने मायाजाल...

सीता को लंका हर लाया !!

घटना सीता हरन की प्रभु को...

नए मोड़ पे ला चुकी थी !

की राम-रावण युद्ध की...

कहानी लिखी जा चुकी थी !!

की लिखा जा चूका था अंत...

सम्पूर्ण राक्षस जाती का !

की लिखा जा चूका था अंत...

अधर्मी प्रजाति का !!

माता सीता की खोज में...

जब वन वन भटक रहे थे राम !

तब साथ मिला सुग्रीव का...

मिले भक्त शिरोमणि हनुमान !!

बजरंगबली लंका पहुंचे...

की लाँघ कर सिंध को !

सुनाया सन्देशा राम का...

दे प्रभु की मुंदरी सिय को !!

फिर लेकर आज्ञा सीता से...

कपिसुर अपनी ताकत दिखलाये !

धु-धु कर लंका को जलाया...

लौट राम के पास आये !!

सुनाया कुशल-क्षेम सीता का...

लंका दहन की गाथा सुनाई !

की गरज उठा बानर दल...

चहुँ ओर बानरी ध्वजा लहराई !!

की निकल पड़ी बानरी सेना...

करने लंका पर चढ़ाई !

किया सागर पार चढ़ सेतु...

प्रभु कृपा से जो नल-निल ने बनायी !!

टकराई राम-रावण की सेना...

धराशायी लंका के वीर हुए !

की हुआ वध, रावण का अंत में...

अंततः विजय रघुवीर हुए !!

बना लंकाधिपति विभीषण को...

लौट राम अयोध्या आये !

मनी दिवाली अवधपुरी में...

की प्रभु सिया को संग लाये !!

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