अंदाज कुदरत का...

अंदाज कुदरत का...


 अंदाज कुदरत का भी... 

इस कलयुग में निराला है !

किसी के हाथों में अमृत...

किसी के होठों पे विष का प्याला है !!

कहीं हरियाली ही हरियाली है...

कहीं वर्षों से अकाल है !

कहीं मोहब्बत की बेड़ियां हैं...

तो कहीं नफरतों का जाल है !!

कोई मुक्क़द्दर का मालिक है...

तो कोई किस्मत का मारा है !

कोई राजा बन बैठा है... 

तो कोई ढूंढता सहारा है !!

दुःख भोग रहा है वो...

ईमान जिसका जिन्दा है !

और सुख मिल रहा उसे... 

जो बईमान परिंदा है !!

यहाँ किसी के क़दमों तले मंजिल...

किसी के पैरों में छाला है !

की खाली पड़ी है मंदिर...

भरा हुआ मधुशाला है !

अंदाज कुदरत का भी...

इस कलयुग में निराला है !!

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