नहीं है जीने की ख्वाहिश...

नहीं है जीने की ख्वाहिश...

 नहीं है जीने की ख्वाहिश...

न किसी ख़ुशी का अरमान है !

तुम हुए हो जुदा जबसे...

ये दिल हो गया वीरान है !!

चल रही है सांसे... 

पर न बाकि मुझमे जान है !

ये जगमगाती दुनिया भी...

अब लगती श्मशान है !!

ये वक़्त का पहिया भी...

कितना बलवान है !

जो है मेरे सपनों में...

उससे मेरा मुक्क़द्दर अनजान है !!

अनजान है वो मेरी चाहत से... 

मेरे मोहब्बत से अनजान है !

अनजान है वो मेरे दर्द से...

मेरी तड़प से अनजान है !!

कैसे समझाऊं उस मुक्क़द्दर को... 

जिसे लिख चूका भगवान है !

कैसे मनाऊं अपने मन को... 

जिसे बस तेरी पहचान है !!

अब नहीं है जीने की ख्वाहिश...

न किसी ख़ुशी का अरमान है !!

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