सुनो दिल्ली !

सुनो दिल्ली !
 

वो जनसेवक जो चुना गया जनता द्वारा... 

पहन सोने का किरीट क्यों इठलाता है !

रहकर दिल्ली के राजसी महलों में...

न जाने क्यों वो मूरख इतना इतराता है !

कल तक निज स्वार्थ हेतु जनता की पांवों पे... 

 रख नाक यूँ जो अपना रगड़ा करता था !

कल तक फैलाये हाथ सबों के सामने... 

भीख जनमत की जो माँगा करता था !

क्यों उसकी नियत आज बदली सी जाती है...

क्यों दुःख उस जनता का नजर नहीं उसे आता है !

क्यों बन बैठा वो एक कपटी और कृतघ्न...

क्यों कर्तव्यों से वो अपने विमुख हुआ जाता है !

क्यों चीत्कार निर्धन की उसे सुनाई नहीं देती... 

क्यों पूंजीपतियों का वो चाटुकार हुआ जाता है !

सुनो दिल्ली ! जब भी फूटा है ज्वार जन के क्रोध का...

तब तब छोटी पड़ गयी तुम्हारी शाही दीवारें !

जब भी आयी सड़कों पे सुनामी जनता की ... 

आ गयी सत्ता की गलियों में हाहाकारें !

सुनो दिल्ली ! कह दो फिर एक बार अपने नेताओं को... 

त्याग घमंड का कर जनता का ध्यान करें !

जिस कार्य हेतु संसद में उनका हुआ चयन...

वो कार्य कर जनसमस्या का समाधान करें !

सुनो दिल्ली ! जरा उन्हें ज्ञात ये भी करवा दो... 

करवटें समय की हर समय बदलती रहती है !

आज यहाँ जिस राजा को हो गया दम्भ...

कल प्रजा उसी का दमन यहाँ पे करती है !

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2 Comments

  1. Present scenario matches with the words...
    Your words match with the present scenario....

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  2. Very nice, isi tarah apni aawaz buland krte raho.

    Jio

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