जिंदगी मेरी तू ....

जिंदगी मेरी तू ....

जिंदगी मेरी तू मुझे बस इतना बता दे... 

ये तुम्हारे दिए दिन मैं कैसे जियूं !

कैसे रहूं इस घुटती दुनियां में... 

मिला हर सांसों में जहर कैसे पियूँ !!

ऐ जिंदगी तू बस इतना बता दे... 

कैसे यहाँ रिश्तों का व्यापार हो गया !

कैसे मिट रही है संवेदनाओं दिलों की...

कैसे हर रिश्ता तार-तार हो गया !!

ऐ जिंदगी तू इन सवालों का तो जवाब दे... 

कैसे फिजायें यहाँ की हर साँस पे भारी हो गयी !

कैसे इंसान यहाँ हैवान हो गया...

कैसे बेआबरू यहाँ की नारी हो गयी !!

जिंदगी मेरी तू मुझे बस इतना बता दे... 

क्यों ऐसा प्रलय का मंजर हो गया !

क्यों सुख रही झीलें और नदियां...

क्यों जमीं यहाँ का बंजर हो गया !!

क्यों टूट रही सांसों की डोरी... 

क्यों बिक रही है हवा भी यहाँ !

जिंदगी तू बस इतना बता दे... 

आखिर क्यों तड़प रहा ये सारा जहाँ !!

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