लौट रही गरीबी...

लौट रही गरीबी...

लौट रही गरीबी नंगे पांव अपने मातृभूमि को जिंदगी की तलाश में !

कभी आयी थी ये शहरों में भटकते-२ चंद रुपयों की प्यास में !!

तब भी ये कदम अविराम थे, अब भी अविराम हैं !

तब भी कहाँ विश्राम था, अब भी कहाँ विश्राम है !!

जिंदगी हार रही इस बदकिस्मती से लड़ाई में !

असहनीय पीड़ा है, वक्त की बेवफाई में !!

सियासतदार सदा से इन्हे मोहरे बनाते आएं हैं !!

इनके हक़ की रोटियां खुद चबाते आये हैं !! 

बस इनके लिए नेताओं के मन में एक ही विचार है !

इनकी इस गरीबी का विरोधी जिम्मेदार है !! 

अरे शर्म करो कुछ, तुम्हारी नियति के ये लोग ही रचनाकार हैं ! 

और तुम ये समझ बैठे की ये बस वोटों का व्यापार है !!

व्यापर छोर अब तो इस विपदा में संवेदनाओं से कुछ काम करो ! 

इनके हक की रोटी इनके घर में देकर इनके क़र्ज़ का भुगतान करो !!

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2 Comments

  1. Kabhi na samjha h ye siyasatdaar...
    Siysat k Nashe me choor h ye siyasatdaar...

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  2. Ekdm sahi likhe ho, kaun sunega, kisko sunaaye, jiski lathi uski bhains

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